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निवेशकों के लाखों लेकर फरार हुई दो चिटफंड कंपनी

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बागेश्वर। लखनऊ की दो चिटफंड कंपनियां स्थानीय निवेशकों के लाखों रुपये लेकर फरार हो गईं। इसका खुलासा होते ही निवेशक भड़क गए। उन्होंने कंपनी के कार्यालय में जमकर हंगामा किया तोड़फोड़ पर आमादा हो गए। गुस्साए निवेशकों ने कोतवाली का घेराव कर जमा रकम दिलाने की मांग की।
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2016 में यूपी के लखनऊ में पंजीकृत दो गैर बैंकिंग कंपनियों ने बागेश्वर में अपनी शाखा खोली थी। तहसील रोड में दोनों कंपनियों एवरग्रीन मल्टीस्टेट कोआपरेटिव सोसाइटी और एवरग्रीन एग्रो मल्टीस्टेट कोआपरेटिव सोसाइटी ने अपना कार्यालय बनाया था। लखनऊ निवासी प्रदीप गुप्ता और सिद्धार्थ गुप्ता इन कंपनियों के निदेशक थे। निदेशकों ने एक स्थानीय महिला को शाखा का प्रबंधन बनाया। इन कंपनियों ने यहां पैर जमाने के साथ ही स्थानीय एजेंटों के माध्यम से निवेश करवाना शुरू कर दिया। कंपनियों ने एफडी, आरडी और दैनिक जमा की स्कीम चलाई थी। इन स्कीमों की एवज में निवेशकों को बेहतर ब्याज का भरोसा दिया गया था। अधिक फायदे के फेर में सैकड़ों स्थानीय लोगों ने इन स्कीमों में निवेश किया।

शनिवार को निवेशकों को इन कंपनियों के बंद होने की जानकारी मिली तो वे भड़क गए। गुस्साए निवेशक एकजुट होकर कंपनियों की स्थानीय शाखा में पहुंचे और जमा की गई रकम लौटाने की मांग करने लगे। संचालिका के फिलहाल असमर्थता जताने पर निवेशक और भड़क गए। उन्होंने कार्यालय में हंगामा करना शुरू कर दिया। भड़के निवेशक तोड़-फोड़ और अभद्रता पर उतारू हो गए। सूचना पर पुलिस मौके से संचालिका और एजेंटों को कोतवाली ले आई। पीछे-पीछे निवेशक भी कोतवाली पहुंचे और प्रभारी कोतवाल का घेराव कर दिया।
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इस दौरान स्थानीय निवासी भावना मर्तोलिया, कैैलाश भोटिया, नरेश, कृष्ण कुमार, रोशनी देवी, शांति देवी, दयाल सिंह, खीम पाल, प्रकाश सिंह आदि निवेशकों ने कंपनी के निदेशक और संचालिका पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया। इस मामले को लेकर कोतवाली में घंटों तक दोनों पक्षों के बीच गहमागहमी चलती रही। बाद में पुलिस ने संचालिका से लिखित इकरारनामा लिया। इसके तहत निवेशकों की रकम लौटाने के लिए तीन माह की मोहलत दी है। प्रभारी कोतवाल एसएस नयाल ने बताया कि यदि तीन माह के भीतर निवेशकों की रकम नहीं मिली तो संचालिका के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।
मई 2017 में बंद हो चुकीं कंपनियां
बागेश्वर। केंद्र सरकार और यूपी सरकार द्वारा एसी फर्जी कंपनियों के खिलाफ अभियान चलाने को दौरान ये कंपनियां मई 2017 में बंद हो चुकी थीं, लेकिन बागेश्वर में इनका दफ्तर चलता रहा। पहले स्थानीय निवेशकों को इसका पता नहीं चला। शक होने पर कुछ निवेशकों ने पड़ताल की तो कंपनियां बंद होने की जानकारी मिली। निवेशकों ने पुलिस को कंपनियों के खिलाफ हुई कार्रवाई की रिपोर्ट से जुड़ी अखबार की कटिंग भी दिखाई।

निदेशकों के फोन हुए बंद
इन कंपनियों के निदेशकों के मोबाइल नंबर बंद हैं। स्थानीय संचालिका ने पुलिस को बताया कि वह काफी समय से निदेशकों से संपर्क का प्रयास कर रही है, लेकिन संपर्क नहीं हो पा रहा। लखनऊ मुख्य शाखा में ताले पड़ चुुके हैं।
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