रानीखेत (अल्मोड़ा)। तो खेती के लिए अब जैविक विधि ही सबसे मुफीद है। उत्तराखंड के बाद यूपी और एमपी जैसे बड़े राज्यों का जिस तरह से जैविक खेती की ओर रुझान बढ़ रहा है, उससे यही संकेत मिल रहे हैं। यूपी में भी अधिकांश स्थानों पर रासायनिक दवाओं के प्रयोग से कई दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।
इससे जहां मिट्टी की उत्पादन क्षमता घट रही है, वहीं रासायनिक खेती से प्राप्त अनाज के सेवन से मवेशियों और बच्चों पर भी कुप्रभाव पड़ रहा है। जैविक खेती की सफलता के लिए यूपी कृषि विभाग ने कृषि अधिकारियों की टीम को यहां मजखाली स्थित जैविक प्रशिक्षण केंद्र भेजा है। अधिकारी यहां जैविक खेती, खाद, कीटनाशक बनाने के तरीके सीखेंगे।
यूरिया, डीएपी, केएपी, एनटीके के अलावा कीटनाशक, फफूंदी नाशक जैसी रासायनिक दवाओं के अधिक प्रयोग से मिट्टी को काफी नुकसान हो रहा है। इससे मिट्टी की उत्पादन क्षमता खत्म हो रही है। इससे उत्पादित अनाज के सेवन से बच्चों और मवेशियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश के यूपी राज्य कृषि प्रबंधन संस्थान रहमानखेडा लखनऊ के कृषि उप निदेशक डा. एचएन सिंह और राष्ट्रीय कृषि प्रशिक्षण प्रसार प्रबंधन संस्थान रहमानखेड़ा के सलाहकार डा. ओपी अग्निहोत्री ने बताया कि निदेशक डा. मुकेश गौतम की पहल पर जैविक खेती का प्रशिक्षण लिया जा रहा है। संभल जिले के कृषि अधिकारी संतोष कुमार सिंह और शरद कुमार सिंह ने कहा कि 75 में से 70 जिलों में खेती किसानी चौपट हो रही है।
जमीन में नाइट्रोजन, पोटाश, फासफोरस की कमी हो गई है। इस मिट्टी में भविष्य में खेती करना संभव नहीं है। जैविक खेती से ही कृषि को बचाया जा सकता है। यहां मुरादाबाद, अमरोहा, बरेली, शाहजहांपुर के अधिकारी, ब्लाक तकनीकी प्रबंधक और सहायक प्रंबधक पहुंचे हैं। अधिकारियों का कहना है कि जैविक खेती के गुर सीखकर उत्तर प्रदेश में भी जैविक खेती का प्रचार-प्रसार किया जाएगा। प्रशिक्षण केंद्र के समन्वयक मनोहर अधिकारी और सुमन महान द्वारा दिया जा रहा है।