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आज मैदान नसीब नहीं कभी अंग्रेज और स्थानीय लोगों की थी संयुक्त फुटबाल टीम

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1932 में रानीखेत की मोहम्मडन स्पोर्टिंग फुटबाल टीम के खिलाड़ी और अन्य। संवाद - फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। आजादी से पूर्व रानीखेत में फुटबाल का गौरवशाली अतीत रहा है लेकिन आज मैदान के अभाव में खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं।
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आजादी से पूर्व अंग्रेज सेना के जवान और स्थानीय युवा साथ साथ फुटबाल खेलते थे। मोहम्मडन स्पोर्ट्स क्लब नाम से गठित पहली फुटबाल संस्था की टीम में आधे खिलाड़ी अंग्रेज थे। बाद में टीम का नाम स्टेशन ए कर दिया गया। इस टीम ने रामपुर चैलेंजर कप सहित तमाम बड़ी प्रतियोगिताएं जीती।
1947 के रानीखेत कप राज्य फुटबाल प्रतियोगिता में चौबटिया इलेवन की टीम ने जीत दर्ज कर स्टेशन ए के विजय अभियान को रोका था। चौबटिया इलेवन से तब द्वितीय विश्व के युद्ध बंदी इटली के कैदी खेलते थे। 1870 से यहां ब्रिटिश आर्मीं की कैमरून रेजीमेंट, आर्टिलरी, रोयल हैजास रैजीमेंट और वर्कशायर रेजीमेंट सहित कई रेजीमेंटें तैनात थी। 1925 में जब कैंट बोर्ड के तत्कालीन सदस्य एजी राजी ने मोहम्मडन स्पोर्ट्स क्लब नाम से फुटबॉल संस्था बनाई तो, ब्रिटिश पल्टनों के जवानों को भी टीम में स्थान दिया गया। सिविल क्षेत्र से टीम में फयाजुद्दीन, इतवारी लाल, मल्लू कारपेंटर, मो. सलीम, कुंदन लाल साह आदि थे।
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1935 में टीम के सदस्य अब्दुल कयूम ने इस संयुक्त टीम को स्टेशन ए नाम दिया। स्टेशन ए ने नैनीताल में आयोजित रामपुर चैलेंज कप सहित कई प्रतियोगिताएं जीती। 1946 में शुरू हुई प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय रानीखेत कप प्रतियोगिता पर कब्जा जमाया। 1947 में इटेलियन कैदियों की चौबटिया इलेवन नामक टीम ने स्टेशन ए की टीम का विजय रथ रोका।
बताते हैं कि1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंदी बनाकर लाए गए इटेलियन कैदियों को चौबटिया में ब्रिटिश सेना की निगरानी में रखा गया था। वह बताते हैं कि अंग्रेज खेलों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को सहयोग करते थे।
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अंग्रेजों ने की थी पहल
रानीखेत। 1869 से ही यहां खेलों की शुुरुआत हुई। अंग्रेजों ने रानीखेत में एक से बढ़कर एक मैदान बनाए, हालांकि बाद में यह मैदान सेना के अधीन हो गए, लेकिन खेल प्रतिभाओं को इसके बाद से ही संघर्ष करना पड़ा। हाकी संघ के जिलाध्यक्ष अगस्त साह ने बताया कि 70 के दशक में यहां ऑल इंडिया स्तर की हाकी प्रतियोगिता हुई। यह प्रतियोगिता सेना के सोमनाथ मैदान में भी आयोजित की गई। विशंबर लाल के नाम से आयोजित यह प्रतियोगिता सहयोग और मैदान के अभाव में 80 के दशक में दम तोड़ गई।
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