अल्मोड़ा। सुप्रसिद्ध साहित्यकार शेखर जोशी भले ही दुनिया से चले गए हों लेकिन कोसी का घटवार, बदबू, मेंटल, नौरंगी बीमार आदि कहानियों के जरिये वह पाठकों के दिलों में हमेशा जिंदा ही रहेंगे। शेखर जोशी के साहित्य में ग्रामीण लोक जीवन का प्रतिबिंब दिखाई देता है। कोसी का घटवार कहानी ने उन्हें हिंदी साहित्य जगत में अलग पहचान दिलाई।
जिले के सोमेश्वर तहसील के अंतर्गत ओलिया गांव में जन्मे शेखर जोशी ने हिंदी साहित्य जगत को काफी समृद्ध किया। कई रचनाओं ने उनके प्रशंसकों की लंबी कतार खड़ी तो की ही साथ ही उनके लेखन ने नई कहानी की पहचान को भी अलग तरीके से प्रभावित किया।
शेखर जोशी का बचपन गांव में बीता था। उन्होंने ग्राम्य जीवन को जिया था। इसकी झलक उनके साहित्य में भी स्पष्ट दिखाई देती है।
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जगत सिंह बिष्ट ने बताया कि कोसी का घटवार शेखर जोशी का प्रसिद्ध कहानी संग्रह है। उन्होंने इस कहानी के जरिए ग्राम्य जीवन का सजीव चित्रण किया है। उनकी कहानियों में पात्र भी स्थानीय होते हैं।
उनके साहित्य में कठिन जीवन संघर्ष, पहाड़ी क्षेत्र की गरीबी, यातना, प्रतिरोध, औद्योगिक मजदूरों के हालात आदि को मार्मिकता से साथ उकेरा है। उन्होंने अपनी कहानियों में पलायन की पीड़ा को भी उजागर किया है। उन्होंने कहा कि शेखर जोशी के साथ कई बार मंच साझा किया। कहीं लगता ही नहीं था कि वह इतने बड़े कथाकार थे। उनकी सादगी से हर कोई प्रभावित होता था। उनके निधन से हिंदी और कुमाऊंनी साहित्य को जो क्षति पहुंची है उसकी भरपाई मुश्किल है।
एमए हिंदी में पढ़ाई जाती है हलवाहा कहानी
अल्मोड़ा। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जगत सिंह बिष्ट ने बताया कि साहित्यकार शेखर जोशी की प्रसिद्ध रचना कोसी का घटवार पूर्व में कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल और सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के बीए हिंदी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती थी। अब उनकी हलवाहा कहानी एमए हिंदी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती है। संवाद
चार साल पहले अंतिम बार गांव आए थे
अल्मोड़ा। वर्ष 2006 में एक पुस्तक विमोचन समारोह में शेखर जोशी अल्मोड़ा आए थे। तीन चार साल पहले वह अंतिम बार अपने गांव आए थे। वह जब भी गांव आते थे तो लोगो से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे। उनके बेटे प्रतुल जोशी आकाशवाणी अल्मोड़ा के केंद्र निदेशक पद से हाल में ही सेवानिवृत्त हुए हैं। संवाद
जीआईसी सोमेश्वर से भी की पढ़ाई
सोमेश्वर। शेखर जोशी ने जीआईसी सोमेश्वर से पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए वह अपने रिश्तेदारों के साथ अजमेर चले गए। वर्तमान में उनके पैतृक घर ओलिया गांव में मोती सिंह रहते हैं। मोती सिंह ही उनके पैतृक घर की देखरेख करते हैं। संवाद
श्रद्धांजलि
शेखर जोशी ने हिंदी, कुमाऊंनी साहित्य जगत को समृद्ध किया। उन्होंने कुमाऊंनी में भी कहानियां, शब्द चित्र, कविताएं लिखी। उनका साहित्य युगों-युगों तक पढ़ा जाएगा।
-डॉ. हयात सिंह रावत, वरिष्ठ साहित्यकार
शेखर जोशी का निधन के बाद भी वह पाठकों के जेहन में रहेंगे। जब भी कोसी का घटवार पढ़ेंगे तो उनकी आसपास उनकी मौजूदगी का अहसास होगा। ऐसा साहित्यकार विरले ही होता है।
-नवीन बिष्ट, वरिष्ठ कवि और साहित्यकार
शेखर जोशी की प्रमुख रचनाएं
हलवाहा
साथ के लोग
नौरंगी बीमार है
कोसी का घटवार
डागरी वाला
मेरा पहाड़
बच्चे का सपना
आदमी का डर
एक पेड़ की याद