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कोरोना का असर कम होने पर मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियों ने लिया पूर्ण आकार

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अल्मोड़ा में बनी मां नंदा सुनंदा की मूर्तियां। कलाकारों ने इन मूर्तियों को इतनी तन्मयता के साथ ब? - फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। कोरोना का असर कम होने पर इस बार नंदादेवी मंदिर में मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां भी पूर्ण स्वरूप में बनाई गई हैं। पिछले वर्ष कोरोना के कारण मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां छोटे आकार की बनाई गई थीं लेकिन अबकी बार सवा दो फीट ऊंची मूर्तियां बनाई गईं हैं।
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नंदादेवी मेले में पिछले कई सालों से रवि गोयल के नेतृत्व में मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है। रवि ने बताया कि कोरोना के कारण पिछले साल मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां करीब डेढ़ फीट ऊंची बनाई गईं थीं। मां नंदा-सुनंदा के दर्शन के लिए मंदिर में दिनभर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। यह मूर्तियां कदली वृक्षों से बनाई जाती हैं। सबसे पहले कदली वृक्षों को मंदिर में लाया जाता है। रिंगाल से मूर्तियों का फ्रेम बनाया जाता है। इसके बाद मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियों को नए वस्त्र धारण कराए जाते हैं। प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्तियों को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिया जाता है। रवि के नेतृत्व में दीपक जोशी, डॉ. सीपी वर्मा, रक्षित साह, रवि कन्नौजिया आदि ने मूर्तियां बनाईं हैं।
चंद शासक काल में मिला नंदा देवी की पूजा को व्यापक स्वरूप
अल्मोड़ा। मां नंदादेवी की पूजा समूचे उत्तराखंड में की जाती है। कुमाऊं अंचल में नंदा देवी की पूजा को व्यापक स्वरूप चंद शासकों के काल में मिला। वर्ष 1670 में कुमाऊं के चंद वंशीय शासक राजा बाज बहादुर चंद बधाणगढ़ के किले से नंदादेवी की स्वर्ण प्रतिमा को अल्मोड़ा लाए। इस प्रतिमा को उन्होंने मल्ला महल (वर्तमान कलक्ट्रेट) परिसर में प्रतिष्ठित कर अपनी कुलदेवी के रूप में पूजना शुरू किया। कत्यूरी, चंद, गढ़वाल के नरेश नंदा को कुल देवी के रूप में पूजते रहे। उसके बाद 1699 में राजा ज्ञानचंद भी बधानकोट से एक स्वर्ण प्रतिमा अल्मोड़ा लाए। 1710 में राजा जगत चंद को बधानकोट विजय के अवसर पर नंदादेवी की प्रतिमा नहीं मिली। इसलिए उन्होंने अपने खजाने से 200 अशर्फियों को गलाकर नंदादेवी की प्रतिमा का निर्माण कराया और यह दोनों प्रतिमाएं भी मल्ला महल स्थित नंदादेवी मंदिर में प्रतिष्ठित की गईं। वर्तमान नंदादेवी मंदिर परिसर में 1690-91 में तत्कालीन नरेश उद्योत चंद ने दो शिव मंदिर उद्योत चंद्रेश्वर और पार्वती चंद्रेश्वर बनवाए।
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