अल्मोड़ा। रसीले काफल पर्वतीय क्षेत्रों की विशेष पहचान हैं लेकिन इन पर ओलों की मार पड़ी है। पिछले दिनों हुई भारी बारिश और ओलावृष्टि से इसका उत्पादन घट गया है। पिछले वर्ष 250 रुपये किलो मिलने वाला काफल इस बार बाजार में 400 रुपये किलो में बिक रहा है। महंगा होने के कारण यह फल नगर क्षेत्र में आम लोगों की पहुंच से दूर हो गया है।
रसीले, खट्टे और मीठे स्वाद से भरपूर काफल पहाड़ों की पहचान है जो बैसाख यानि अप्रैल-मई में बाजार पहुंचता है। जिले के लमगड़ा, रानीखेत, जागेश्वर, हवालबाग सहित अन्य हिस्सों के एक हजार से अधिक लोग इसे बाजार में बेचकर अच्छी आय कमाते हैं लेकिन इस बार मौसम की बेरुखी का इसके उत्पादन पर असर पड़ा है। बीते दिनों इन क्षेत्रों में हुई ओलावृष्टि से फल गिर गए और इसका उत्पादन 40 प्रतिशत से अधिक घटा है।
बेहद कम मात्रा में बाजार में पहुंचने से इसकी कीमत बढ़ गई है। इस कारण कई लोग इसका स्वाद नहीं ले पा रहे हैं। लमगड़ा के विशन ने बताया कि वह काफल बेचकर बीस से पच्चीस हजार रुपये की आय अर्जित करते थे लेकिन ओलों से फल खराब होने से इस बार वे इतना नहीं कमा पाएंगे। अन्य लोगों का भी यही दर्द है।
रसीले काफल के लाभ
अल्मोड़ा। काफल का वानस्पतिक नाम मेरिका एस्कुलाटा है। यह समुद्र तल से 1300 मीटर से 2100 मीटर (4000 फीट से 6000 फुट) तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिलता है। यह जंगली फल एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर है। इस फल के उपयोग से पेट के विकार दूर होते हैं। मानसिक बीमारी में भी यह लाभदायक है। इसके तने की छाल, अदरक, दालचीनी के मिश्रण के प्रयोग से अस्थमा, डायरिया, बुखार, टाइफाइड, फेफड़े की बीमारी दूर होती है।