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Almora News: छह माह बाद मिल सकी थी आजादी की खबर

Fri, 11 Aug 2023 11:25 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
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फोटो- 11 एएलएम 14पी-सल्ट विकासखंड का ऐतिहासिक खुमाड़ गांव जो पलायन की मार झेल रहा है। संवाद
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मौलेखाल (अल्मोड़ा)। आजादी की लड़ाई का गवाह और केंद्र रहे सल्ट विकासखंड का खुमाड़ गांव का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यहां के चार आंदोलनकारियों ने ब्रिटिश अधिकारी की गोली खाकर आजादी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया लेकिन यहां के लोगों को आजादी के छह माह बाद देश की आजादी की खबर मिल सकी। यहां हुई खुमाड़ क्रांति के एकमात्र गवाह 90 वर्षीय अन राम ने बताया कि जब आजादी मिलने के बाद जेलों में बंद ग्रामीण छह माह बाद वहां से छूटकर घर लौटे तो तब सभी को आजादी की खबर मिल सकी। अपने लोगों पर चली गोली की घटना को याद कर वह आज भी सिहर उठते हैं लेकिन उनके चेहरे पर आजाद देश की खुली हवा में सांस लेने की खुशी भी है।
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खुमाड़ क्रांति के गवाह रहे अन राम बताते हैं कि जब पांच सितंबर 1942 को ब्रिटिश अधिकारी जॉनसन दल-बल के साथ गांव पहुंचा तो उनकी उम्र नौ या 10 साल के करीब रही होगी। बताया कि खुमाड़ गांव में तब आजादी के लिए हो रहे आंदोलन की रणनीति बन रही थी। भीड़ देखकर अधिकारी बौखला गया और उसने अपने सैनिकों को उन पर गोली चलाने का हुक्म दे दिया लेकिन उसके सैनिक भी आसपास के लोग थे तो उन्होंने अपने लोगों पर गोली चलाने से मना कर दिया। तब अधिकारी जॉनसन ने खुद भीड़ पर गोली दाग दी जिसमें गांव के चार आंदोलनकारी शहीद और 12 से अधिक लोग घायल हुए थे।
इस घटना के बाद गांव के युवा और सक्षम लोगों ने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अन्य शहरों का रुख किया। आखिरकार तीन साल बाद देश को आजादी मिली लेकिन इसकी खबर गांव तक पहुंचने में छह माह का समय लगा। बताया कि जब विभिन्न जेलों में बंद आंदोलनकारी वहां से छूटकर गांव लौटे तो उन्होंने स्थानीय लोगों को आजादी की सूचना दी। तब गांव में जश्न मनाया गया जिसमें वह भी शामिल रहे।
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पलायन की मार झेल रहा खुमाड़
मौलेखाल। आजादी की लड़ाई का केंद्र रहे ऐतिहासिक खुमाड़ गांव के आंदोलनकारियों ने देश को गुलामी की जंजीर से आजाद कराकर भावी पीढ़ी के विकास के लिए अपना बलिदान तो दिया लेकिन उन्होंने जो सपना देखा था वह आज भी पूरा नहीं हो सका है। यह गांव भी पलायन की मार झेल रहा है। आजादी की लड़ाई का दौर देख चुके ग्रामीण बताते हैं कि सात दशक पहले तक गांव में 250 परिवार रहते थे लेकिन बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में 60 प्रतिशत परिवार पलायन कर चुके हैं और अब गांव में सिर्फ 100 परिवार ही रह गए हैं।




बदहाल शहीद स्मारक का कोई सुधलेवा नहीं

मौलेखाल। खुमाड़ में आजादी की लड़ाई का गवाह शहीद स्मारक बदहाल है। शहीदों की याद में स्मारक तो बना दिया गया मगर उसका कोई सुधलेवा नहीं है। स्मारक परिसर में गंदगी फैली है। स्मारक का मुख्य प्रवेश द्वार जर्जर हो चुका है। इस स्मारक तक पहुंचने का मुख्य मार्ग भी बदहाल है। ग्रामीणों के मुताबिक पांच सितंबर को स्मारक पर रंगरोगन और सफाई होती है लेकिन इसके बाद सालभर इसकी तरफ कोई नहीं झांकता।





बोले ग्रामीण

आजादी की लड़ाई का हिस्सा रहे खुमाड़ गांव के लोगों को छह माह बाद आजादी की खबर मिली लेकिन बदहाल व्यवस्थाओं से हमें आज भी आजादी नहीं मिली है। आजादी के नायकों का स्मारक बदहाल है। गांव के इंटर कॉलेज में शिक्षक कम हैं। - अन राम, खुमाड़।




गांव में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। रोजगार का अभाव सबसे बड़ी समस्या है। सरकार को गांवों में रोजगार के साधन बढ़ाने चाहिए। जब हर युवा को याेग्यता के मुताबिक रोजगार मिलेगा तो देश तरक्की करेगा और यही असल आजादी होगी। - गिरीश कांडपाल, खुमाड़।




पलायन का मुख्य कारण बेरोजगारी है। बच्चों को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। जंगली जानवर भी खेती उजाड़ रहे हैं और इससे भी लोगों का मोहभंग हो रहा है। ऐसे में गांव पलायन की मार सहते हुए वीरानी की तरफ बढ़ रहा है जिसे रोकने की जरूरत है। -भागा देवी, खुमाड़।

फोटो- 11 एएलएम 14पी-सल्ट विकासखंड का ऐतिहासिक खुमाड़ गांव जो पलायन की मार झेल रहा है। संवाद

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