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Almora News: जिला अस्पताल में किट न होने से हेपेटाइटिस जांच तीन माह से ठप

Thu, 27 Jul 2023 11:27 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
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अल्मोड़ा। हेपेटाइटिस लीवर या यकृत की बीमारी है। यह हेपेटाइटिस बी वायरस से होती है। लीवर के अधिक खराब होने पर बीमारी से पीड़ित मरीज की मौत भी सकती है। दूषित पानी हेपेटाइटिस रोग का प्रमुख कारण है। जिले के कई हिस्सों में दूषित पानी की आपूर्ति हो रही है। जिले के प्रभारी मंत्री डॉ. धन सिंह रावत की बैठक में भी यह बात उजागर हुई है। ऐसे में जिले में यह रोग गंभीर रूप ले सकता है।
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इसके बावजूद इससे निपटने के लिए जिम्मेदार महकमे संजीदा नहीं हैं। आलम यह है कि जिला अस्पताल में हेपेटाइटिस की पहचान के लिए बेहद जरूरी किट तीन माह से नहीं हैं। तब से यहां इसकी जांच ठप है जबकि हर माह 100 से 150 मरीज हेपेटाइटिस की जांच के लिए यहां आ रहे हैं जिन्हें मायूस होकर लौटना पड़ रहा है।
मानसूनकाल में नगर की प्यास बुझाने वाली पंपिंग योजना से दूषित पानी की आपूर्ति हो रही है। जिला अस्पताल से मिले आंकड़ों के अनुसार पहले यहां हर माह औसतन 100 से 150 लोगों की हेपेटाइटिस की जांच होती थी लेकिन तीन माह से यहां जांच पूरी तरह ठप है। यहां जरूरी किट न होने के कारण जांच के लिए उन्हें निजी अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।
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हेपेटाइटिस की चपेट में आने वाले लोगों में जिला कारागार के कैदी अधिक
अल्मोड़ा। जिले में राहत की बात यह है कि हेपेटाइटिस रोग की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है। जिला प्रतिरक्षण अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार पिछले वर्ष अप्रैल से इस वर्ष मार्च तक 750 लोगों की हेपेटाइटिस की जांच की गई। इनमें से महज सात लोग हेपेटाइटिस बी से से ग्रसित मिले। गंभीर बात यह है कि इनमें से छह रोगी जिला कारागार के बंदी और कैदी हैं। हालांकि पांच रोगी इस रोग से पूरी तरह उबर चुके हैं। जिले में हेपेटाइटिस बी के सिर्फ दो रोगी उपचाराधीन हैं।

सालों से नहीं चला टीकाकरण अभियान

अल्मोड़ा। जिला प्रतिरक्षण कार्यालय के अनुसार नवजात शिशुओं को अस्पतालों में हेपेटाइटिस का निशुल्क टीकाकरण होता है लेकिन आम लोगों को इस रोग से बचाव के लिए जिले में सालों से टीकाकरण अभियान नहीं चलाया गया। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक हेपेटाइटिस की टीका लगाने के लिए लोगों को इसके लिए निजी व्यवस्था करनी होती है।
इन कारणों से आ सकते हैं हेपेटाइटिस की चपेट में
जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ. प्रांशु डेनियल ने बताया कि यदि कोई इंजेक्शन से नशा करता है। किसी को असुरक्षित तरीके से इंजेक्शन लगा है या किसी ने नाक-कान छिदवाया है या शरीर पर टैटू बनवाया है तो वे हेपेटाइटिस रोग की चपेट में आ सकते हैं। असुरक्षित यौन संबंध भी इसका कारण बन सकता है। दूषित पानी और खाद्य सामग्री का प्रयोग इसकी सबसे बड़ी वजह है।
यह है बचाव
डॉ. प्रांशु डेनियल ने बताया कि हेपेटाइटिस बी का उपचार एंटी वायरल दवा है। यदि समय रहते उपचार नहीं हुआ तो इससे लीवर कैंसर होने का खतरा है। हेपेटाइटिस सी का उपचार तीन से छह माह में संभव है।


जिला अस्पताल में हेपेटाइटिस की जांच के लिए किट नहीं हैं जो जल्द उपलब्ध होंगी। रक्त जांच से भी इस रोग की पहचान हो सकती है। - डॉ. एचसी गड़कोटी, पीएमएस, जिला अस्पताल, अल्मोड़ा।


बागेश्वर में हेपेटाइटिस का कोई मरीज पंजीकृत नहीं

बागेश्वर। जिले में हेपेटाइटिस का एक भी मरीज जिला अस्पताल में पंजीकृत नहीं है। अस्पताल में बीमारी से संबंधित टीके नहीं हैं। अस्पताल में बीमारी के टीके भी उपलब्ध नहीं है। मरीज को टीके लगाने के लिए बाहर से मंगवाने पड़ते हैं।

हेपेटाइटिस संक्रामक रोग है। यह पांच प्रकार ए, बी, सी, डी और ई में होता है जिनमें हेपेटाइटिस बी को खतरनाक माना जाता है। इस बीमारी में लीवर में सूजन और जलन होती है। हेपेटाइटिस के लक्षण थकान, पेट में दर्द, भूख की कमी, वजन बढ़ना, त्वचा का पीला पढ़ना, बुखार आना आदि हैं। बीमारी के शुरुआती लक्षणों की अनदेखी करने पर मरीज की स्थित गंभीर हो सकती है। बीमारी से बचाव के लिए शून्य से पांच साल के शिशुओं को टीके लगाए जाते हैं। बीमार पढ़ने पर भी टीकाकरण होता है। टीका लगाने से बीमारी को 95 प्रतिशत कम करने का दावा किया जाता है।

जिले में फिलहाल स्वास्थ्य विभाग के पास हेपेटाइटिस के मरीजों का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. चंद्रमोहन भैसोड़ा बताते हैं कि हेपेटाइटिस के मरीजों का यहां इलाज संभव नहीं है। इस बीमारी से मिलते-जुलते लक्षण वाले मरीज को हायर सेंटर भेजा जाता है।
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