स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी। फाइल फोटो
जैंती (अल्मोड़ा)। प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी का पैतृक गांव तल्ला बिनौला सिस्टम की उपेक्षा की भेंट चढ़ गया है। गांव में सुविधाओं का टोटा है। आजादी के 76 साल बाद भी पैतृक गांव में उनकी स्मृति में न तो कोई प्रतिमा लग सकी है और न ही कोई संग्रहालय बन सका है।
जैंती तहसील के तल्ला बिनौला निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया लेकिन उनका पैतृक गांव आज भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। आजादी के 76 साल बाद भी पैतृक गांव तल्ला बिनौला में क्रांतिकारी धौनी की प्रतिमा नहीं लग सकी है। ग्रामीण गांव में धौनी की स्मृति में संग्रहालय बनाने की मांग वर्षों से करते आ रहे हैं लेकिन अब तक यह मांग पूरी नहीं हुई है। गांव को जोड़ने वाली जैंती-तल्ला बिनौला सड़क में डामरीकरण भी नहीं हुआ है। पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य धना धौनी ने कहा कि सरकारों ने क्रांतिकारी धौनी के गांव की कोई सुध नहीं ली है। राम सिंह धौनी के पौत्र जगदीश सिंह धौनी ने गांव में धौनी के नाम पर संग्रहालय नहीं बनाए जाने पर नाराजगी जताई। कहा कि क्रांतिकारियों के गांव की सरकारें कोई सुध नहीं लेती हैं।
धौनी ने कार्मिकों, शिक्षकों के लिए खादी वस्त्र पहनना अनिवार्य कराया
जैंती। क्रांतिकारी राम सिंह धौनी का जन्म 24 फरवरी 1893 में अल्मोड़ा जिले के तल्ला बिनौला गांव में कुंती देवी और हिम्मत सिंह धौनी के घर में हुआ था। वह बचपन से ही पढ़ाई में कुशाग्र थे। धौनी जब डिस्ट्रक्ट बोर्ड सदस्य थे, उसी दौरान ब्रिटिश सरकार ने खादी पर रोक लगा दी थी, लेकिन उन्होंने बोर्ड में प्रस्ताव पास कराकर बोर्ड के सभी कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए खादी वस्त्र पहनना अनिवार्य कर दिया। 1928 में वह सालम आ गए और चौखुरी में मिडिल स्कूल की स्थापना की। लोगों में आजादी और शिक्षा के प्रति अलख जगाई। 12 नवंबर 1930 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।