अल्मोड़ा। जिला एवं सत्र न्यायाधीश डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने भनोली तहसील क्षेत्र में दो शिक्षकों द्वारा एक युवती के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद युवती के गर्भवती हो जाने के मामले में दोनों आरोपी शिक्षकों को बरी कर दिया है। जिला जज ने युवती के विरोधाभाषी बयानों के आधार पर यह फैसला सुनाया। युवती ने दोनों शिक्षकों पर बहला-फुसलाकर बलात्कार करने का आरोप लगाया था, लेकिन बाद में अदालत में दिए गए बयानों में उसने दोनों के साथ स्वेच्छा से संबंध बनाने की बात कही। युवती के बयानों के आधार पर दोनों आरोपी शिक्षक दोषमुक्त कर दिए गए।
जिला न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा है कि दोनों आरोपी शिक्षक समाज के जिम्मेदार सदस्य हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह समाज के उच्च आदर्शों और मानदंडों को बनाए रखें। भारत की आने वाली पीढ़ी को शिक्षा देना, नैतिक मूल्यों का ज्ञान कराने के साथ ही समाज के उच्च मानदंडों और पारिवारिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना उनका कार्य है। आदेश में आगे कहा है कि दोनों आरोपी शिक्षकों ने अपनी पुत्री की उम्र के बराबर की महिला को उपभोग की वस्तु मानते हुए शारीरिक संबंध बनाए जो भारतीय समाज में मान्य नहीं है, लेकिन इसके बावजूद इस कृत्य को कानूनी तौर पर गलत नहीं कहा जा सकता। इसलिए दोनों आरोपियों को दोषमुक्त किया जाता है। न्यायाधीश ने फैसले में यह भी कहा है कि अगर पक्षकार (राज्य) इस आदेश से संतुष्ट नहीं हो तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
कोर्ट की टिप्पणी : परंपरावाद स्त्री को लैंगिक स्वतंत्रता के हक से वंचित करता है
जिला एवं सत्र न्यायाधीश डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने अपने फैसले में उल्लेख किया है कि युवती ने 161 और 164 के बयानों में यह स्वीकार किया कि उसने दोनों शिक्षकों के साथ स्वेच्छा से संबंध बनाए। युवती के बयानों के आधार पर दोनों आरोपी शिक्षकों को दोषमुक्त किया जाता है। जिला न्यायाधीश ने अपने आदेश में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 में दिए गए लैंगिक अभिविन्यास और लैंगिक स्वतंत्रता का उल्लेख करते हुए कहा है कि भारतीय समाज में पारंपरिक तौर पर वयस्क लड़की के विजातीय संबंधों (हेट्राजीनस संबंधों) को नैतिकता के आधार पर मान्यता नहीं दी जाती है। कुछ हद तक यह सही भी है, परंतु वयस्क लड़की अथवा स्त्री स्वैच्छिक तौर पर लैंगिक स्वतंत्रता को विजातीय संबंधों में लेकर आती है, तो सामाजिक और पारिवारिक दबाव के चलते अपनी आत्मा की इच्छा के विरुद्ध जाकर भी शारीरिक इच्छा की पूर्ति के लिए अपराध को जन्म देती है। इससे यह प्रतीत होता है कि भारतीय समाज में प्रचलित परंपरावाद स्त्री को लैंगिक स्वतंत्रता के अधिकार के प्रयोग करने से वंचित करता है।