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कारगिल के शहीदों की शहादत को सरकारों ने भुला दिया

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शहीद मोहन सिंह बिष्ट। - फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। वतन की आन के लिए खुद को कुर्बान करने वाले कारगिल के शहीदों की कुर्बानियों को सरकारों ने भुला दिया। अल्मोड़ा कारगिल के वीरों की वसुधा है पर आज शहीद ही बेगाने हो गए हैं। कारगिल शहीदों के गांवों में उनका स्मारक तक नहीं है। ऐेसे में आने वाली पीढ़ियां शहीदों की वीरगाथाओं से कैसे रूबरू हो सकेंगी।
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जिले के खड़ाऊं गांव निवासी मोहन सिंह बिष्ट तीन जुलाई 1999 को कारगिल में शहीद हो गए थे। कारगिल युद्ध के कई साल गुजर जाने के बाद भी उनका पैतृक गांव उपेक्षित है। अमर उजाला ने शहीद की वीरांगना विमला देवी से बात की तो उनका दर्द छलक आया। विमला देवी ने बताया कि कारगिल युद्ध के कई वर्षों बाद भी सरकार ने शहीद मोहन सिंह बिष्ट की स्मृति में गांव में स्मारक तक नहीं बनाया है। बताया कि उन्होंने खुद अपने पैसों से शहीद मोहन सिंह बिष्ट की स्मृति में गांव में स्मारक बनाया है।
तत्कालीन सरकार की ओर से कारगिल शहीदों के परिजनों के लिए की गई घोषणाओं का उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध के इतने वर्षों बाद भी सरकारों ने शहीद के गांव की कोई सुध नहीं है। उन्होंने कहा कि अब एक ही इच्छा है कि शहीद मोहन सिंह बिष्ट की स्मृति में खड़ाऊ में उनका भव्य स्मारक बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी तक उनके साहस और बलिदान की कहानियां पहुंच सकें। उन्होंने कहा कि एक सैनिक देश के लिए अपनी कुर्बानी दे देता है लेकिन उसके परिजन शहीद के स्मारक के लिए सालों तक इंतजार करते हैं। संवाद
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विमला के दर्द की कोई थाह नहीं..बस आह है
अल्मोड़ा। शहीद मोहन सिंह बिष्ट की वीरांगना विमला बिष्ट को आज भी अपने पति की शहादत पर गर्व है। बकौल विमला तीन जुलाई 1999 के दिन को अभी भी नहीं भूली हूं। उस दिन खेत में काम कर रही थीं। तभी उनकी शहादत की सूचना मिली। आंगन से आनन तक उदासी छा गई। तब बड़ी बेटी सुमन सात साल, मझली बेटी विद्या साढ़े चार साल, तीसरी बेटी नीतू ढाई साल की थी। शहादत के समय बेटा गर्भ में पल रहा था। उनकी शहादत के बाद 18 अक्तूबर 1999 को बेटा हुआ। पति की शहादत के बाद विमला पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा पर हिम्मती विमला ने इस पहाड़ से संघर्ष कर अपने पति के सपनों को पूरा किया। पापा की लाड़ली विद्या को एमकॉम कराया। वह पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी कर रही है जबकि दूसरी बेटी नीतू ने एमएससी बीएड कराया। विमला के दर्द की कोई थाह नहीं.....बस आह है। संवाद
बहादुर मां ने पति को खोया पर बेटे को भेजा देश सेवा में
अल्मोड़ा। विमला बिष्ट के बच्चे हमेशा उनसे अपने पापा के बारे में पूछते थे तो विमला उन्हें मोहन सिंह बिष्ट की वीरगाथा सुनाया करती थीं। भाई-बहन फोटो में पापा को सेना की वर्दी में देखते थे और मां की जुबानी उनकी बहादुरी की कहानी भी सुनते थे। बेटा रौबिन सिंह बिष्ट पापा के नक्शे कदम पर चलकर सेना में भर्ती हो गया। विमला ने कहा कि पति ने देश सेवा के लिए अपनी शहादत दे दी। अब बेटा देश सेवा कर रहा है। मुझे दोनों पर नाज है। संवाद
शहीद देवड़ी के गांव में नहीं पहुंची सड़क
अल्मोड़ा। कारगिल शहीद हरीश देवड़ी का पैतृक गांव देवड़ा में उनका स्मारक तक नहीं बन पाया है। वर्तमान में उनका परिवार सरकारी की आली में रहता है। पति की शहादत के बाद उनकी पत्नी सावित्री देवी को कई संघर्षों से जूझना पड़ा। सावित्री देवी ने बताया कि उनकी शहादत के वक्त बड़ा बेेटा दीपक 11 और संजय सात साल का था। शहीद के पैतृक गांव देवड़ा में आज तक उनका स्मारक नहीं बना है। दल बैंड से शहीद के गांव के लिए बनाई जा रही पांच किमी सड़क का निर्माण अधूरा पड़ा है। इससे गांव वालों को यातायात सुविधा का लाभ नहीं मिल रहा है। संवाद
कारगिल के शहीदों की याद ताजा करता है पार्क
अल्मोड़ा। कारगिल युद्ध में जिले के कैप्टन आदित्य मिश्रा, हवलदार तम बहादुर क्षेत्री, हवलदार हरी सिंह थापा, नायक हरी बहादुर घले, हरीश सिंह देवड़ी, राम सिंह बोरा, मोहन सिंह शहीद हुए थे। नगर के शिखर तिराहे पर बने शहीद चौक में शहीद पार्क बनाया गया है जिसमें जिले के सभी कारगिल शहीदों के नाम अंकित हैं। पार्क की दशा खराब है। पार्क की रेलिंग कुछ लोगों के कपड़े सुखाने के काम आती है। संवाद
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