हमारी प्राकृतिक चिकित्सा का उल्लेख वेद, पुराण और शास्त्रों में है, लेकिन हम उसका श्रेय विदेशी विद्वानों को देते हैं। इस दौरान कुलसचिव डाॅ. सुनीता पांडेय, उपकुलसचिव हरीशचंद, प्रो. अमिता सिंह मौजूद रहीं। स्वागत प्रो. सुशील कुमार गौतम, प्रो. संजय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. एनपी सिंह और संचालन डाॅ. चंद्रमणि ने किया।
प्रथम सत्र में डाॅ. रमेश चंद्र ने कहा कि थायराइड के अनियंत्रण के फलस्वरूप शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर दुष्प्रभाव देखने को मिलता है। इसका निदान तमाम यौगिक क्रियाओं से किया जा सकता है। गर्दन के व्यायाम विशेषकर सूर्य नमस्कार, उज्जैनी त्रिबंध के साथ बहुत लाभकारी होता। प्रो. सरस्वती काला देहरादून ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत कार्य हुए हैं, लेकिन वह आम जन तक नहीं पहुंच पाए। लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति विश्वास कम है।
स्वामी शंकरानंद सरस्वती ने कहा कि योग और प्राकृतिक चिकित्सा एक दूसरे के पूरक हैं। अज्ञानता को दूर करना है तो उसे जानना होगा, अर्थात चल रहे विषयों में सुधार की आवश्यकता है। देश भर से आए प्रतिभागियों ने 30 से भी ज्यादा शोध पत्र प्रस्तुत किए।