वीआईपी चले गए, सत्कार उत्सव बीत गया। मंगलवार को घाटों पर जिंदगी फिर पुराने ढर्रे पर आ गई। एक दिन की पाबंदी के बीच उत्सव की चर्चा हुई और काशी का हर घाट अपने पुराने स्वरूप में आ गया। महादेव की नगरी की खासियत ही यही है, बनारस यही है। यहां जिंदगी सुस्ताना जानती ही नहीं, बैरिकेडिंग हटते ही पुरानी रौ में दौड़ पड़ती है।
मंगलवार को घाटों का नजारा देखकर यकीन करना मुश्किल था कि एक दिन पहले ही यहां प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति का भव्य स्वागत समारोह हुआ था। यहां की जिंदगानी अपने पुराने फक्कड़ अंदाज में थी। दशाश्वमेध घाट पर दुकानें सज गई थीं।
सीढ़ियों पर भिखारी अपनी पुरानी जगह ठसककर बैठ गए थे। हाथ में बिंदी, पत्थरों, मोतियों की माला लिए बच्चों की टोली टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हुए निकल पड़ी। घाटों पर धार्मिक क्रियाकलाप जोरों पर दिखे। पंडे-पुजारी मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधान से यजमानों का तिलक कर रहे थे।
दूसरी तरफ सीढ़ियों पर जोड़ों में सकुचाती दुलहनें पतियों के साथ गंगा पूजन कर रही थीं। मेहमानों की आवभगत के चलते सोमवार को यहां गंगा पूजन नहीं हो पाया था। यही वजह थी कि मंगलवार को उनकी ही संख्या ज्यादा थी। हरिश्चंद्र घाट पर चिता जल रही थी।
पास ही घाट पर धोबी कतारबद्ध कपड़े धो-सुखा रहे थे। भैंसों को भी कई दिनों बाद गंगा में नहाने का मौका मिला। जिस चेत सिंह घाट पर बौद्ध अनुयायियों ने शांति का संदेश के प्रतीक के रूप में प्रार्थना व बौद्ध के उपदेश का मंचन किया, वह घाट दूसरे दिन भी शांत था।
ऐसा नहीं था कि अतिथि सत्कार के निशान घाट पर नहीं थे। कई जगह फूलों की माला सजी थी तो कहीं पताकाएं। लोग वहां सेल्फी लेने की होड़ में थे। सड़कों पर कल तक लगे गमले, मोदी-मैक्रों के कटआउट भले हटा दिए गए हों लेकिन तुलसी घाट पर अतिथियों का कटआउट उसी शान से खड़ा था।
अस्सी घाट पर फूलों की माला तो सजी थी, रंगोली के रंग बिखर गए थे। दूर गंगा का दूसरा किनारा उनको देख रहा था। वहां लगे दोनों देशों के झंडे हट गए थे, जैसे आभूषण निकालने के बाद रेती अपनी सादगी दिखा रही हो।