भाषाओं की प्रवृत्तियां कहीं न कहीं एक-दूसरे से उसी प्रकार मिलती हैं जैसे डीएनए। यदि हम अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें, तो पाएंगे कि उनके अंग एक-दूसरे से जुड़ते भी हैं और अलग भी होते हैं। यह बातें सोमवार को बीएचयू के अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र एवं मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘उदीयमान – सांस्कृतिक एवं सामाजिक अध्ययन के नये आयाम’ के उद्घाटन में प्रो. रामानंद शर्मा ने कहीं। पहले सत्र में प्रो. राजकुमार, प्रो. रविकांत और प्रो. अवधेश मिश्र ने विचार रखे। संचालन प्रतीक्षा श्रीवास्तव ने किया। द्वितीय सत्र में रीतिकालीन अध्ययन के नए आयामों पर केंद्रित व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। तृतीय सत्र औपनिवेशिक आधुनिक अध्ययन के नए आयामों को समर्पित रहा। संगोष्ठी का समापन 24 फरवरी को होगा।