सितार, सरोद और गायन के साथ हुआ विराम
संकटमोचन संगीत समारोह की पांचवीं निशा
माई सिटी रिपोर्टर
वाराणसी। ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन... की धुन जब अनूप जलोटा के स्वर में कानों में घुली तो हर श्रोता चैतन्य हो उठा। सुर से सुर मिलने लगे और रागिनियों के राग बिखर उठे। संकटमोचन मंदिर के प्रांगण में भक्ति रस की अविरल धारा में हर किसी ने गोता लगाया। इसके बाद भक्ति गीतों की शृंखला भोर में 3:30 बजे तक श्रोताओं को मगन करती रही।
शुक्रवार की मध्य रात्रि के बाद 1:45 बजे अनूप जलोटा ने मंच संभाला। उन्होंने शुरुआत अपनी सबसे चर्चित भजन ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन...से की। इसके बाद अच्युतम केशवम् रामनारायणम्..., कौन कहता है भगवान आते नहीं..., मेरे मन में राम तन में राम..., दुनिया चले न श्रीराम के बिना..., बजते बजते आज अचानक मेरी बंसी टूट गई... श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम..., जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा..., इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले... के जरिये श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। गीतों के साथ हर श्रोता तालियां बजाकर सुर से सुर मिला रहा था। इसके बाद छठवीं प्रस्तुति में चंडीगढ़ के डाॅ. प्रभाकर-दिवाकर कश्यप मंच पर पहुंचे। उन्होंने राग ललित की अवतारणा की। विलंबित एक ताल में निबद्ध पवन पुत्र हनुमान पूरण कीजै सब काम... के प्रभावी गायन के बाद झप ताल में मध्य लय में कृपा करो कपीश सुर, नर, मुनि ईश... ने श्रोताओं पर गहरा प्रभाव छोड़ा। एक ताल में द्रुत लय से उन्होंने विराम दिया। तबले पर अरविंद कुमार आजाद, हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र, सारंगी पर विनायक सहाय ने संगत की। सातवीं प्रस्तुति में 30 साल बाद धारवाड़ घराने के अंकुश एन. नायक ने सितार वादन की स्वरलहरियों से पूरे परिसर को झंकृत कर दिया। उन्होंने राग बसंत मुखारी... पूरी तन्मयता के साथ बजाया। विराम प्रस्तुति में मैहर घराने के वरिष्ठ कलाकार जोधपुर से आए पं. बसंत काबरा ने सरोद वादन किया। राग विलासखानी तोड़ी के साथ ही उन्होंने एक से बढ़कर रागों की अवतारणा सरोद के तारों पर की।