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काशी तो हृदय में बसती है साहब: पद्मभूषण पं. साजन मिश्र का बनारस के बचपन का नाता, संगीत को बनाया जीवन का लक्ष्य

Tue, 17 Jan 2023 03:03 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

बनारस और बनारस के संगीत पर विचार करते हुए पद्मभूषण पं. साजन मिश्र कहते हैं कि बनारस रसों से भरा हुआ शहर है। बचपन में जब शुरूआत हुई, जब थोड़ा होश संभाला, बनारस में संगीत का अच्छा माहौल था। बड़े-बड़े कलाकारों को सुनने का अवसर मिलता था तो यह उत्सुकता बनी रहती थी कि काश हम भी इस उपलब्धि को हासिल करें। 
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पद्मभूषण पं. राजन मिश्र- पं. साजन मिश्र - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 जन्मस्थान है हमारा काशी। बनारस में जन्म लेने से जो आंतरिक अभी तक सुख की प्राप्ति हो रही है बनारसीपन की, उसकी अभिव्यक्ति कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। बनारस एक ऐसा शहर है जो शिव की नगरी है, मां गंगा का किनारा है। वहां का संगीत जो है एक अलग विचारधाराओं से गूंथा हुआ रहा है। जहां संगीत की तीनों त्रिवेणी मिलती है। गायन, वादन और नृत्य की कलाएं हैं। ईश्वर की कृपा से हम लोगों को ऐसे-ऐसे बुजुर्गों का सत्संग मिला, जिनके साथ रहकर बहुत कुछ जानने का अवसर मिला। बनारस घराने के दिग्गज कलाकार पिताजी पं. हनुमान मिश्रा, चाचाजी पं. गोपाल मिश्रा, पं. हरिशंकर, पं. दामोदर मिश्र, पं. सामता प्रसाद का सानिध्य मिला। वह सुख बनारस में जन्म लेने से ही प्राप्त हो पाया। सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, बिस्मिल्लाह खां साहब के साथ सत्संग का मौका मिला। उनको नजदीक से जानने का मौका मिला। उसका आनंद ताजिंदगी रहता है। आज का जो युवा अपने बुजुर्गों से बहुत दूर हो गया है। यह उनका दुर्भाग्य कहें या समय की बातें हैं। लेकिन हम लोग इस मामले में बेहद भाग्यशाली रहे कि बुजुर्गों के साथ समय बिताया। 
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बनारस और बनारस के संगीत पर विचार करते हुए पद्मभूषण पं. साजन मिश्र कहते हैं कि बनारस रसों से भरा हुआ शहर है। बचपन में जब शुरूआत हुई, जब थोड़ा होश संभाला, बनारस में संगीत का अच्छा माहौल था। बड़े-बड़े कलाकारों को सुनने का अवसर मिलता था तो यह उत्सुकता बनी रहती थी कि काश हम भी इस उपलब्धि को हासिल करें। बड़े-बड़े कलाकारों के बीच हमारा भी कार्यक्रम हो। पिता जी शुरू से कहते थे कि बेटा नाम के लिए मरना पेट के लिए मत मरना। क्योंकि पेट ईश्वर ने दिया है तो कहीं न कहीं से पालन करेगा। अगर नाम के लिए परिश्रम करोगे तो उस परिश्रम के फल की ताजिंदगी अनुभूति कर सकोगे। हम लोगों ने उसी विचारधारा से संगीत को अपनाया। उसमें यह कभी भी नहीं सोचा कि हम कितना पैसा लेंगे। पैसा वहां कहीं भी सोच में नहीं आया। पिताजी भी कहते थे कि पैसा सेकेंड्री होता है। जब तुम्हारा अच्छा काम होगा, अच्छा गाना बजाना होगा तो पैसा स्वत: आएगा तुम्हारे पास। मां सरस्वती की आराधना में लगो। जब बड़े भैया पं. राजन मिश्र थे तो हम लोग आराधना भाव से ही गाना बजाना करते थे। आज मैं गा रहा हूं तो भी आराधना भाव ही रहता है। हम केवल प्रार्थना कर सकते हैं। यह संगीत कोई दुकान नहीं है जहां हम कोई सामान बेच रहे हैं। हमने जो संगीत सीखा है उसे किस तरह से भगवान को प्रार्थना भाव से समर्पित कर सकें। ईश्वर की कृपा से वह भाव रखने से वही प्रार्थना भाव रखने से पूरे विश्व में पं. राजन-साजन मिश्र को जाना गया। लोग प्यार करते हैं। बड़े कलाकारों का कमेंट रहा है कि शुद्धता से गा रहे हैं। यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि रही है। पं. जसराज जी ने कहा था कि ईमानदारी का गाना गाते हैं आप लोग, यह हमारे लिए बहुत बड़ा अवार्ड है। अपने बड़ाें से पाया हुआ आशीर्वाद है जो किसी भी पुरस्कार से कम नहीं है।

उस जमाने में संगीत सुनने और समझने का माहौल था
पुराने दौर को याद करते हुए पं. साजन मिश्र ने कहा कि कार्यक्रमों की शृंखला बढ़ी है रोज ही कहीं ना कहीं आयोजन होते रहते हैं। पहले संगीत परिषद हुआ करती थी पांच से छह दिन के आयोजन होते थे। उस समय सुनने वाले बड़े गुणी लोग हुआ करते थे और कलाकार भी गंभीर थे। यह सोचते थे कि हम बनारस जा रहे हैं तो अपना बेहतरीन प्रस्तुति दें और दो तारीफ लेकर आएं। बनारस में संकट मोचन होता है। श्री हनुमान जी का दर्शन और उनको सुनाने के लिए कलाकार आते हैं। बहुत अच्छा लगता है वहां पर लोगों को। हम लोगों के जमाने में संगीत सुनने का और समझने का जो माहौल था उसमें बदलाव आया है। परिवर्तन जीवन का अभिन्न अंग है। समय के हिसाब से परिवर्तन आता है। हम लोग अपने को भाग्यशाली समझते हैं कि हम लोग ऐसे काल में पैदा हुए जहां संगीत को समझने के  लिए हम लोग जाते थे। अगर हम विलायत खां को सुनने गए हैं तो वहां से उनसे कुछ पाने की इच्छा लेकर जाते थे कि वहां उनसे कुछ मिलेगा। पं. ओकारनाथ ठाकुर को सुनने गए हैं तो वह कैसे सुर लगा रहे हैं, सुरों की कितनी सच्चाई है उसको जानने के लिए गए हैं। 
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आज के कलाकार हो गए हैं बड़े उस्ताद, छूट गया है विद्यार्थी भाव
हमारे पिताजी का कहना था कि हर विद्वान के भीतर में कुछ देखोगे तो कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा। जब आप विद्यार्थी बनकर जाएंगे तब। आज के कलाकार है वह खुद ही इतने बड़े उस्ताद हो गए हैं कि उनका विद्यार्थी भाव छूट गया है। हम लोग तो आज भी विद्यार्थी भाव में ही जी रहे हैं। यह सत्य है। पीढ़ियों का अंतर है। आज का युवा अच्छा गा रहा है। तैयार गा रहा है। वह सोचते हैं कि वह सर्वश्रेष्ठ हो गए हैं, जबकि दुनिया में शेर का सवा शेर हमेशा तैयार रहता है। इसलिए आप विद्यार्थी बने रहेंगे तो आपके अंदर विनम्रता बनी रहेगी। विनम्रता रहेगी तो बु्द्धि सही रहेगी। जैसी जिसकी तालीम हुई है वह वैसा ही व्यवहार करता है। हमको जैसी तालीम मिली है हम उसी को अभिव्यक्त कर रहे हैं। शास्त्रीय संगीत की दुनिया के जो दिग्गज चले गए उस तरह के संगीत की परिकल्पना भी नहीं कर सकते हैं। पुराने पत्ते झड़ते हैं, नए पत्ते उगते हैं। वह पुराने पत्ते 60 साल की तपस्या के बाद झड़े हैं, उनकी जो यात्रा रही है। उसमें कितने अनुभव जुड़े हैं, वह संगीत में नजर आता है। 

पहले गुरु के घर जाकर सीखते थे, आज पॉकेट में घूम रहे हैं गुरुजी
पद्मभूषण पं. साजन मिश्र बदलाव को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि आज तो स्पीडी युग आ गया है। पहले गुरु के घर में जाकर सीखते थे आज तो ऑनलाइन मोबाइल में पॉकेट में गुरु जी घूम रहे हैं। आज के युवा बहुत तेज हैं और यूट्यूब से ज्ञान लेते हैं। अब वह स्थिति नहीं है कि रूबरू गुरु की साधना करें। अब चार से पांच साल में गला चलने लगा तो इंटरनेट से लेकर गाना शुरू कर देते हैं। जो जानने वाले हैं वह पहचान जाते हैं कि कितना पका हुआ चावल है। कितना पुराना बासमती है और कितनी खूशबू देगा। हर युग में ऐसे परीक्षण करने वाले लोग रहेंगे। आप अपना सौ प्रतिशत दिजिए। हर जगह अपना सौ प्रतिश देने का प्रयास करेंगे तो खुद भी संतुष्ट होंगे। हृदय में विनम्रता, प्रेम और श्रद्धा रहेगी तो संगीत की साधना के सुर भी निखर उठेंगे। 

काशी तो हृदय में बसती है साहब
पं. साजन मिश्र कहते हैं कि काशी तो हृदय में बसती है साहब। जब भी मौका मिलता है आते हैं बैट्री चार्ज करते हैं। गुरु की ड्योढ़ी को मस्तक से लगाते हैं। चुपचाप आते हैं और अपनी बैट्री चार्ज करके निकल जाते हैं। मन तो यही होता है कि काशी में ही रहें। अभी समय का भी खेल है। बाबा जब चाहेेंगे तभी संभव हो जाएगा। अपना घर है, जन्मस्थान है। बनारस की खूशबू, भोजन, माहौल, वो गलियां, और वो चौबारा दिल्ली में कहां नसीब होगा। अपना समय अब बनारस में ही बिताने का मन करता है। 
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