पुलिस ने विवेचना शुरू की तो सामने आया कि विजय के रूप में मुख्तार अंसारी ही झारखंड का कोयला कारोबारी बनकर कारोबार के सिलसिले में नंद किशोर रूंगटा से मिला था। चुनाव के लिए मुख्तार को पैसा चाहिए था। उसने नंद किशोर रूंगटा से कारोबार के संबंध में बातचीत करने के लिए उन्हें अपनी वैन में बैठाया और फिर उनका अपहरण कर तीन करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी। पुलिस से शिकायत करने पर परिजनों को बम से उड़ाने की धमकी देकर मुख्तार अंसारी ने पहली किस्त वसूल भी ली थी, लेकिन उसके बाद नंद किशोर रूंगटा का कहीं पता ही नहीं लगा। ।
कहा जाता है कि नंद किशोर रूंगटा की हत्या कर शव प्रयागराज में ठिकाने लगा दिया गया था। परिजनों को अब तक नंदकिशोर का शव नहीं मिला है। इसकी टीस पूरे परिवार को है। यह मामला सामने आने के बाद अपहरण के मुकदमे में हत्या और आपराधिक षड्यंत्र संबंधी धाराएं भी बढ़ा दी गईं। नौ आरोपियों में से तीन को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। इसके बाद एक अगस्त 1997 को मुकदमे की विवेचना सीबीआई को सौंप दी गई थी
सीबीआई को विवेचना सौंपे जाने से पहले भेलूपुर थाने के तीन विवेचकों ने नंद किशोर रूंगटा केस की जांच की थी। पुलिस ने नौ आरोपियों को चिह्नित कर नामजद किया था। उनमें मुख्तार अंसारी, गुरमीत सिंह उर्फ हैप्पी, जसविंदर सिंह, परविंदर सिंह, अताउर रहमान उर्फ बाबू उर्फ सिकंदर, सहाबुद्दीन, मूसे भाई, लालजी यादव उर्फ मास्टर और जितेंद्र तिवारी का नाम शामिल था। इनमें से गुरमीत, जसविंदर और परविंदर को 18 मार्च 1997 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। गाजीपुर के महरूपुर निवासी अताउर रहमान और सहाबुद्दीन पर आज भी सीबीआई की ओर से दो-दो लाख रुपये का इनाम घोषित है। मुकदमे में आगे क्या हुआ, इसके बारे में भेलूपुर थाने की पुलिस के साथ ही कमिश्नरेट के उच्चाधिकारियों को भी कोई जानकारी नहीं है।
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नंद किशोर रूंगटा के अपहरण और हत्या की घटना से उनके परिजन 26 साल बाद भी नहीं उबर पाए हैं। जवाहर नगर एक्सटेंशन में रहने वाले उनके परिजनों को पुलिस सुरक्षा मिली हुई है। शनिवार की दोपहर घर पर सन्नाटा पसरा था। सुरक्षा में तैनात गार्डों ने कहा कि यहां किसी से बात नहीं हो पाएगी। काफी प्रयास के बाद नंद किशोर रूंगटा के बेटे नवीन रूंगटा ने संक्षिप्त बात की। उन्होंने कहा कि कि जब पिता जी का अपहरण हुआ था, तब वह लगभग 23-24 साल के थे। उनके चाचा महावीर प्रसाद रूंगटा मुकदमे के वादी हैं ।
सीबीआई की देखरेख में मुकदमा अदालत में लंबित है। 22 जनवरी 1997 के बाद से उन्होंने अपने पिताजी को नहीं देखा। उनकी हत्या की बात कही गई, लेकिन उन्हें उनके पिताजी का शव भी नसीब नहीं हुआ। सीबीआई से भी इस संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं मिली। एमपी-एमएलए कोर्ट से मुख्तार अंसारी को 10 साल की सजा सुनाए जाने की बात पर नवीन ने कहा कि ईश्वर और अदालत पर हमें भी पूरा भरोसा है।