उस समय को याद करते हुए भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता ब्रह्मदेव मिश्र बताते हैं कि लालजी टंडन तब भाजपा की ओर से विधानसभा में नेता सदन थे। उन्हें जब इस घटना की खबर मिली, वह अगले दिन ही जौनपुर आ गए। मड़ियाहूं कस्बे में भगत सिंह तिराहे के पास उस दौरान मंच लगा, वहां पर हजारों कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़ी थी।
सभा को संबोधित करते हुए लालजी टंडन ने प्रशासन और तत्कालीन सपा सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने इस मुद्दे को सदन में उठाने का एलान किया। उनके जोशीले भाषण का असर था कि बाद में प्रशासन को बैकफुट पर आना पड़ा। सभा के बाद जब वह वापस मड़ियाहूं डाक बंगला पहुंचे तो लंबी यात्रा के थकान और कमजोरी के कारण उन्हें चक्कर आने लगा और उनकी तबीयत बिगड़ गई थी।
इसके बावजूद वह पीड़ित परिवार से मिलने उनके घर जाना चाह रहे थे। खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर उन्हें वापस लखनऊ भेजा गया। ब्रह्मदेव मिश्र का कहना है कि लालजी टंडन जुझारू नेताओं में से थे। पहली बार उनका यह तेवर नजदीक से देखने को मिला था।
कार्यकर्ताओं के प्रति उनके मन मे भरपूर सम्मान था। उनके निधन से गहरी क्षति पहुंची है। पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह का कहना है कि लालजी टंडन अभिभावक सरीखे थे। उनके साथ सदन में बैठने का मौका मिला तो काफी कुछ सीखने को मिला। वह हर कार्यकर्ता को पूरा सम्मान और पिता के रूप में मार्गदर्शन देते थे।
उदार व्यक्तित्व और जुझारू तेवरों का ही असर था कि सभासद से लेकर राज्यपाल तक का सफर तय किया। अब ऐसे नेताओं की कमी होती जा रही है।