देवी कूष्मांडा के जन्मोत्सव पर शुक्रवार को काशी के कलाकारों ने मां का संगीतार्चन किया। इस अवसर पर प्रात: काल से लेकर मध्यरात्रि तक मां के दरबार में विविध धार्मिक अनुष्ठान भी किए गए। महंत ने माता को 250 किलो जलेबा का भोग लगाया तो भक्तों ने भी माता के तिरंगा स्वरूप की झांकी का दर्शन करके आशीर्वाद लिया।शुक्रवार को रात्रि साढ़े आठ बजे मां कूष्मांडा के दरबार में संगीतार्चन का श्रीगणेश जवाहर लाल और साथियों ने राग यमन में देवी अर्चना से किया। इसके उपरांत पारंपरिक कजरियों की धुन मां से मां कूष्मांडा का अभिषेक किया। काशी के आशीष मिश्र ने कजरी से गायन की शुरुआत की। इसके उपरांत पारंपरिक पचरा और देवी गीत मां को अर्पित किए। बीएचयू के प्रो. राकेश कुमार ने बांसुरी की स्वरलहरियों से मां की आराधना की। उन्होंने राग यमन में आलाप से शुरुआत की। इसके उपरांत विलंबित और द्रुत लय में धुनों की प्रस्तुति की। उनके साथ तबले पर ललित कुमार ने संगत की। संगीतार्चन का अंतिम पुष्प सितारवादन रहा। विजय जायसवाल ने सर्वप्रथम राग जोग में विलंबित लय में आलाप बजाया। राग मालकौंस में जोड़ और झाला से वादन को विस्तार दिया। समापन पारंपरिक भजन की धुन से हुआ। उनके साथ तबले पर ऋषि कुमार ने संगत की। संगीतार्चन का संयोजन व्यवस्थापक पं. ताड़केश्वर दुबे ने किया।
इससे पूर्व प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में भगवती कूष्मांडा को पंचामृत स्नान कराया गया। इसके उपरांत मंदिर के अर्चकों ने तीन रंगों की मालाओं से मां का तिरंगा शृंगार किया। इस शृंगार के दर्शन सायंकाल साढ़े छह बजे तक भक्तों को हुए। सायंकालीन आरती के समय मां को 251 किलो जलेबा का विशेष भोग मंदिर के महंत पं. ज्ञानेश्वर दुबे ने विधान पूर्वक अर्पित किया। रात्रि आठ बजे सवा किलो कपूर से मां की विराट आरती की गई। आरती के दौरान मंदिर परिसर भक्तों से खचाखच भरा रहा। रात्रि साढ़े आठ बजे से मध्यरात्रि 12 बजे तक दरबार में संगीतार्चन किया गया। मध्यरात्रि ठीक 12 बजे मंदिर के प्रधान पुजारी ने मां की आरती कर गर्भगृह के द्वार बंद किए।