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Varanasi News: इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण होते हैं साहित्यिक साक्ष्य

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बीएचयू के प्राचीन इतिहास विभाग की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने अपनी बात रखी। मुख्य अतिथि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलाधिपति प्रो. केडी त्रिपाठी ने कहा कि इतिहास लेखन में साहित्यिक साक्ष्यों का होना बहुत जरूरी है। इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता है।
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संर्घष एवं प्रतिरोध का इतिहास : प्राचीन भारत के विशेष संदर्भ में विषय पर आयोजित संगोष्ठी में प्रो. त्रिपाठी ने प्रत्यक्ष के आधार पर ही इतिहास लेखन हो इस अवधारणा का खंडन किया। भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रो. राकेश उपाध्याय ने भारतीय इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में हुए प्रतिरोध और संघर्ष को रेखांकित किया। कार्यक्रम में विभाग की शोध पत्रिका भारती, खंड 44 का भी अनावरण किया गया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ इतिहास विभाग के पूर्व आचार्य प्रो. अशोक सिंह ने कहा कि अरबों के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध बहुत लंबे समय तक चला, जिसमें अरबों को प्रारंभ में असफलता हाथ लगी।
बीएचयू प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसर मणिशंकर शुक्ला ने बाहर से आए अतिक्रमणकारियों के कारण कला और संस्कृति में आ रहे बदलावों की चर्चा की। अध्यक्षता बीएचयू के कुलानुशासक प्रो. वीके शुक्ल ने की। इस दौरान प्रो. सुमन जैन, प्रो. महेश प्रसार अहिरवार, प्रो. प्रवेश श्रीवास्तव, प्रो. विजय शंकर शुक्ल, प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे आदि मौजूद रहे।
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