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Varanasi News: नौकरी छोड़कर स्कूटर से मां को दुनिया दिखाने निकले ''''कृष्ण''''

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मां के साथ कश्मीर से कन्याकुमारी निकले कृष्ण का काशी में स्वागत
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नौकरी छोड़कर स्कूटर से सितंबर 2020 में मैसूर से शुरू की थी यात्रा
62 हजार किलोमीटर का सफर कर चुके तय, तीन देशों का भी किया भ्रमण


माई सिटी रिपोर्टर
वाराणसी। माता-पिता की सेवा के लिए श्रवण कुमार की हमेशा से नजीर दी जाती है। हालांकि, कर्नाटक के मैसूर निवासी कृष्ण कुमार (44) जिस अंदाज में अपनी माता को लेकर बनारस पहुंचे, लोग उन्हें कलियुग का श्रवण कुमार कह रहे हैं। दो हेलमेट, बैग में जरूरी सामान, दो पानी की बोतलें और एक छाता लेकर केए-09 एक्स 6143 नंबर की 25 साल पुरानी बजाज की चेतक स्कूटर से कृष्ण अपनी मां को देश और दुनिया दिखाने निकले हैं। अभी तक वह 62 हजार किमी से ज्यादा की दूरी तय कर तीन देशों की यात्रा कर चुके हैं।
सोमवार को बनारस पहुंचने पर कृष्ण और उनकी मां चूड़ारत्नम (74) का तुलसी घाट पर स्वागत हुआ। अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि मां के लिए समर्पित ऐसा पुत्र वंदनीय है। कृष्ण ने 2020 सितंबर में मैसूर से यात्रा शुरू की थी। कई प्रदेशों का भ्रमण करने के बाद चित्रकूट, प्रयागराज होते हुए वह वाराणसी पहुंचे हैं। नौकरी छोड़कर कृष्ण ने मां को मंदिरों में दर्शन-पूजन कराने के उद्देश्य से स्कूटर से यात्रा शुरू की। यात्रा को उन्होंने मातृ सेवा संकल्प नाम दिया है। कृष्ण कुमार ने बताया कि उनकी यही इच्छा है कि उनकी मां देश के सभी मंदिरों में दर्शन पूजन करें। वह पिता द्वारा उपहार में मिली स्कूटर से ही पावन यात्रा पर निकले हैं।
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2016 में छोड़ी नौकरी, नहीं की शादी
पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर रहे कृष्ण कुमार ने शादी नहीं की है। बताया कि मैसूर में उनकी मां ने संयुक्त परिवार की सेवा में उम्र बिता दी। वन विभाग में कार्यरत रहे पिता दक्षिणामूर्ति की 2015 में मृत्यु हुई तो बंगलूरू में रह रहे कृष्ण मां को अपने पास ले आए। एक दिन मां ने बताया कि उन्होंने घर के बाहर कभी कोई जगह नहीं देखी। जिस पर उन्हें लगा जिस मां ने उन्हें पूरी दुनिया देखने के काबिल बनाया, वह आज तक कुछ नहीं देख सकीं। उसी समय फैसला किया कि मां को मंदिरों के दर्शन कराएंगे। वर्ष 2016 में उन्होंने नौकरी छोड़कर यात्रा शुरु कर दी। इस यात्रा में पिता के स्कूटर को हमसफर बनाया, ताकि पिता की याद भी बनी रहे। स्कूटर से वह नेपाल, भूटान, म्यांमार देशों की यात्रा मां के साथ कर चुके हैं और अब कश्मीर से कन्याकुमारी तक निकले हैं।
लॉकडाउन में देश की सीमा पर फंसे रहे
कृष्ण ने बताया लॉकडाउन के दौरान वह मां के साथ यात्रा पर थे। भूटान पहुंचे तो पता चला सीमाएं सील हैं। कोरोना के उस दौर में एक माह 22 दिन उन्होंने भारत-भूटान सीमा के जंगलों में गुजारे। इसके बाद जब पास बना तो एक सप्ताह में 2673 किलोमीटर स्कूटर चलाकर मैसूर आ गए। सब कुछ सामान्य होने के बाद 15 अगस्त 2022 से उन्होंने दोबारा यात्रा शुरु की है।
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व्यक्ति के जाने के बाद इज्जत देने का क्या मतलब
यात्रा के पीछे की प्रेरणा के बारे में वह बताते हैं कि जब लोग दुनिया से अंतिम विदा ले लेते हैं तो उनकी फोटो पर माला चढ़ाकर मृतक की इच्छाओं के बारे में बात करते हैं, उन्हें याद करते हैं। जबकि रिश्तों, व्यक्तियों का खयाल जीते जी रखना चाहिए। मैं यह मलाल लेकर नहीं जीना चाहता था। इसलिए पिता के गुजर जाने के बाद मां को अकेला छोड़ने की बजाय उन्हें दुनिया दिखाने का निर्णय लिया।
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