वाराणसी: गोष्ठी में बोलते जल पुरुष राजेंद्र सिंह।
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जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि काशी में गंगा किनारे बन रहा विकास का तथाकथित मॉडल विनाशकारी है। बनारस को निडर होकर गंगा के साथ खिलवाड़ के खिलाफ खड़ा होना होगा। जब भी देश पर संकट आया है काशी के विद्वतजनों ने सामने आकर नए रास्ते खोजने की कोशिश की है। वह बुधवार को पराड़कर भवन में काशी विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित गंगा की मुश्किलों पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि गंगा को बचाने के अभियान को रोजाना गतिविधियाें और नई सूझ के साथ जोड़ना होगा। स्वच्छ गंगा और खोई हुई पहचान को वापस पाने के लिए हमें संघर्ष करना होगा। इतिहासकार मो. आरिफ ने बताया कि गंगा सिर्फ बहते हुए पानी का नाम नहीं है, हमारी पहचान हैं। अकबर और औरंगजेब ने तब जल की सफाई के लिए वैज्ञानिक नियुक्त किए थे और इसके औषधीय गुणों को पहचानकर ही इसे नहर ए बिहिश्त यानी स्वर्ग की नदी माना था।
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र ने कहा कि गंगाजी हमारे जीने का माध्यम हैं। गंगा की 2525 किलोमीटर लंबी जीवनधारा में-से बनारस में पड़ने वाला पांच किलोमीटर लंबा हिस्सा धर्म, अध्यात्म, संस्कृति और नदी की सेहत के लिहाज से बहुत जरूरी है। नहर निकालकर गंगा के इकोसिस्टम के साथ जो खेल हो रहा है वह हमें बहुत महंगा पड़ेगा। आलोचक व्योमेश शुक्ल ने कहा कि शुद्ध जल के बगैर किसी तीर्थ की कल्पना नहीं की जा सकती है। अध्यक्षता महंत विवेकदास ने की।