बीएचयू के चांसलर गिरधर मालवीय।
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बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर मचे घमासान के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एवं बीएचयू के चांसलर न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय ने नियुक्ति को सही बताया है। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर आज महामना होते तो डॉ. फिरोज खान के नाम पर पहले मुहर लगाते। उन्होंने संकाय के शिक्षकों को छात्रों को समझाने का सुझाव देते हुए कहा कि अगर शिक्षक समझाएंगे तो छात्र जरूर समझेंगे।
सवाल: नियुक्ति के विवाद को कैसे खत्म किया जा सकता है?
जवाब: अध्यापकों को चाहिए कि वह अपने विद्यार्थियों को समझाएं। मेरा स्पष्ट कहना है कि अगर महामना होते तो इसका (डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का) स्वागत करते। इनकी (डॉ. फिरोज खान) नियुक्ति को अप्रूव कर देते कि बिल्कुल ठीक है। जो विभाग है, वहां तो गुरु का सम्मान बहुत होता है। जिन गुरु लोगों को वहां के छात्र मानते हैं, उनको चाहिए कि वह जाकर समझाएं। अभी तो वहां गुरु शिष्य परंपरा होगी। शिक्षक अगर जाकर समझाएंगे तो छात्रों को समझ में आ जाएगा। विद्यार्थियों को आंदोलन समाप्त करना चाहिए, इसका कोई औचित्य नहीं है।
सवाल: संकाय में महामना द्वारा (केवल हिंदू संबंधी) शिलापट्ट लगाने की बात कही जा रही है?
जवाब: महामना कभी लगा ही नहीं सकते। उनकी दृष्टि बहुत विशाल थी। निजाम हैदराबाद से उन्होंने कहा था कि जितने हिंदू हैं, वह सब भारतीय हैं। गैर हिंदू वाली बात भी गलत है। कभी कोई विभागाध्यक्ष, प्रिंसपल रहे होंगे तो उन्होंने शिलापट्ट लगवा दिया होगा। वो शिलापट्ट महामना का लगाया नहीं है। महामना में जरा सी संकीर्णता नाम की कोई चीज नहीं थी। वह उदारवादी थे। जब उन्होंने कहा था कि छूआछूत कुछ नहीं है, हरिजनों को मंत्र देंगे, तब तो बनारस के पंडितों ने उनके ऊपर जूते चप्पल भी फेंके थे, इसके बाद भी महामना अडिग थे।
सवाल: विश्वविद्यालय की छवि देशभर में धूमिल हो रही है?
जवाब: बीएचयू प्रशासन ने कह दिया है कि हम नियुक्ति को सपोर्ट करते हैं। ठीक कहा है उनको सपोर्ट करना ही चाहिए। विषय के सबसे अच्छे विशेषज्ञ बैठे थे, वे संस्कृत के विद्वान थे। इनके (डॉ. फिरोज के) मुकाबले और कोई स्टैंड नहीं करता है। जिन लोगों ने आवेदन किया था, उनमें ये (डॉ. फिरोज खान) सबसे अच्छे थे, इसलिए उनका सेलेक्शन हुआ। लोग तो ढूंढकर अच्छे गुरु के पास जाते हैं। जहां अच्छा ज्ञान प्राप्त हो, यूनिवर्सिटी में उसका हमेशा स्वागत होना चाहिए।
सवाल: विद्यार्थियों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: सीधे कहूंगा, विद्यार्थी अपना आंदोलन समाप्त करें। पढ़ने के लिए आए हैं, जाकर पढ़ेें। उनको ये नहीं करना है कि उनको कर्मकांड पढ़ाना है। साहित्य पढ़ना है, उनसे पढ़ें। यह अच्छी बात है। कर्मकांड पढ़ाना ही नहीं है, उसके लिए नियुक्ति ही नहीं हुई है। अगर आर्ट्स कॉलेज में राजनीतिशास्त्र में किसी की नियुक्ति होगी तो वह कॉलेज में जाकर संस्कृत थोड़े ही पढ़ाएगा।
सवाल: बीएचयू को लेकर अब राजनीति भी होने लगी है?
जवाब: यह सब बहुत गलत है। लोगों को चाहिए कि बच्चों को उन्नति के रास्ते दिखाएं, उनको गलतफहमी में न डालें। विद्यार्थी गलत कर रहे हैं। बीएचयू की छवि खराब न करें। सांप्रदायिक स्थल न बनाएं बीएचयू को। औवैसी जैसे लोग सांप्रदायिकता फैलाते हैं। वे लोगों को तोड़ने का काम करते हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षक और छात्र दोनाें शिक्षा के प्रचार-प्रसार की बात ही करें।