वाराणसी का गीत-संगीत घराना और प्रख्यात कलाविद अपनी प्रस्तुति देते हैं। गंगा आरती दूसरा सबसे भव्य नजारा है। गंगा जी में दीपदान इसे अलौकिक रूप दे देती है। शहीदों के सम्मान में दशाश्वमेध घाट पर पुष्प माला अर्पण, महाराज वाराणसी का आना, स्नान करना, सभी घाटों पर लोगों का हूजूम पूरे बनारस परिक्षेत्र को जीवंत बना देता है।
यह समाजिक सहयोग महोत्सव है वाराणसी के लोगों और इसके आयोजन कर्ताओं ने उत्सवधर्मी क्षेत्र में देव दीपावली को सामाजिक सहयोग महोत्सव का रूप देकर इसे काफी पहले ही भव्य बना दिया था। ऐसा लगता है जैसे आकाश गंगा ही काशी में उतर आई है। इस दिन महाराज वाराणसी भी आकर गंगा में स्नान करते हैं और पारंपरिक रस्म पूरी करते हैं।
पौराणिक मान्यता में कहा जाता है कि वाराणसी के राजा दिवोदास ने देवताओं का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था। तब तीनों लोकों में त्रिपुरासुर का राज था। तब भगवान शिव ने त्रिपुरासुर से तीनों लोकों को मुक्ति दिलाने के बाद रूप बदलकर गंगा जी में स्नान किया था।
यह पता चलने पर दिवोदास ने भी देवताओं से न केवल प्रतिबंध हटाया, बल्कि खुद आकर गंगाजी में स्नान किया। बताते हैं कि प्रतिबंध हटने के बाद देवताओं ने भी बनारस में गंगा जी के किनारे दीपावली मनाई।