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Gyanvapi Case: ज्ञानवापी परिसर हिंदुओं को सौंपने की याचिका पर आज भी नहीं आया कोर्ट का आदेश, अब 17 को सुनवाई

Mon, 14 Nov 2022 03:39 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

वादिनी किरन सिंह की तरफ से ज्ञानवापी में मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित करने, परिसर हिंदुओं को सौंपने और पूजा पाठ रागभोग की अनुमति मांगी गई थी। मामले में सुनवाई पूरी हो चुकी है। कोर्ट के आदेश का इंतजार है। 
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वाराणसी कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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ज्ञानवापी परिसर में हिंदुओं को सौंपने सहित तीन मांगों से संबंधित याचिका पर आज भी कोर्ट का आदेश नहीं आ सका। सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट महेंद्र कुमार पांडेय की अदालत को यह तय करना कि यह मुकदमा सुनवाई योग्य है या नहीं है। संबंधित वाद में फिर एक बार आदेश को अगली तारीख के लिए टाल दिया गया। कोर्ट ने सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तिथि तय की है।

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इस मामले में बीते 15 अक्तूबर को ही अदालत में दोनों पक्षो की दलीलें पूरी हो गई थीं। तभी से आदेश में पत्रावली लंबित है। इससे पहले इस वाद पर 8 नवंबर को ही आदेश आना था। मगर, कोर्ट के पीठासीन अधिकारी के अवकाश पर होने के कारण 14 नवंबर की तिथि तय कर दी गई थी। अब मामले की सुनवाई अब 17 नवंबर को होगी।

क्या हैं वो तीन मांगें
इस प्रकरण में वादिनी किरन सिंह की तरफ से मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित करने, परिसर हिंदुओं को सौंपने और शिवलिंग की पूजा पाठ राग भोग की अनुमति मांगी गई थी। अदालत में दोनों पक्ष अपनी बहस पूरी कर उसकी लिखित प्रति दाखिल कर चुके हैं। 
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'ज्ञानवापी का गुंबद छोड़कर सब कुछ मंदिर का'

ज्ञानवापी - फोटो : अमर उजाला
वादिनी किरन सिंह के अधिवक्ताओं ने दलील में कहा था कि वाद सुनवाई योग्य है या नहीं, इस मुद्दे पर अंजुमन इंतजामिया की तरफ से जो आपत्ति उठाई गई है, वह साक्ष्य व ट्रायल का विषय है। ज्ञानवापी का गुंबद छोड़कर सब कुछ मंदिर का है जब ट्रायल होगा तभी पता चलेगा कि वह मस्जिद है या मंदिर।  

दीन मोहम्मद के फैसले के जिक्र पर कहा कि कोई हिंदू पक्षकार उस मुकदमे में नहीं था इसलिए हिंदू पक्ष पर लागू नहीं होता है। यह भी दलील दी कि विशेष धर्म स्थल विधेयक 1991 इस वाद में प्रभावी नहीं है। स्ट्रक्चर का पता नहीं कि मंदिर है या मस्जिद। जिसके ट्रायल का अधिकार सिविल कोर्ट को है।

कहा कि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने और मस्जिद बनवाने का आदेश दिया था। वक्फ एक्ट हिन्दू पक्ष पर लागू नहीं होता है।  ऐसे में यह वाद सुनवाई योग्य है और अन्जुमन की तरफ से पोषणीयता के बिंदु पर दिया गया आवेदन खारिज होने योग्य है। 
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हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने दलीलें रखी थी कि राइट टू प्रॉपर्टी के तहत देवता को अपनी प्रॉपर्टी पाने का मौलिक अधिकार है। ऐसे में नाबालिग होने के कारण वाद मित्र के जरिये यह वाद दाखिल किया गया है। भगवान की प्रॉपर्टी है, तब माइनर मानते हुए वाद मित्र के जरिये क्लेम किया जा सकता है। स्वीकृति से मालिकाना हक हासिल नहीं होता है। यह बताना पड़ेगा कि संपत्ति कहां से और कैसे मिली। अदालत में वाद के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट की 6 रूलिंग और संविधान का हवाला भी दिया गया। 
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मुस्लिम पक्ष की दलील

ज्ञानवापी परिसर और काशी विश्वनाथ मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया।
वहीं मुस्लिम पक्ष यानि अंजुमन इंतजामिया मसाजिद की तरफ से मुमताज अहमद, तौहीद खान, रईस अहमद, मिराजुद्दीन खान और एखलाक खान ने कोर्ट में प्रतिउत्तर में सवाल उठाते हुए कहा था कि एक तरफ कहा जा रहा है कि वाद देवता की तरफ से दाखिल है। वहीं दूसरी तरफ पब्लिक से जुड़े लोग भी इस वाद में शामिल हैं।

यह वाद किस बात पर आधारित है, इसका कोई पेपर दाखिल नहीं किया गया है और कोई सबूत नहीं है। कहानी से कोर्ट नहीं चलती, कहानी और इतिहास में फर्क है। जो इतिहास है वही लिखा जाएगा। साथ ही कानूनी नजीरे दाखिल कर कहा था कि वाद सुनवाई योग्य नहीं है और इसे खारिज कर दिया जाए।
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