उन्होंने कहा, मूर्ति स्वयंभू प्राकृतिक है। इसलिए प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा चार इस मामले में लागू नहीं होगी। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश सात के नियम 11 की अर्जी वाद के तथ्यों पर ही तय होगी। सिविल वाद में लिखा है कि स्वयंभू विश्वेश्वर नाथ मंदिर सतयुग से है। 15 अगस्त 1947 से पहले और बाद में लगातार निर्बाध रूप से पूजा की जा रही है। याची का यह कहना कि कोई स्वयंभू भगवान सतयुग में नहीं था। इसका निर्धारण साक्ष्य से ही हो सकता है। यह भी तर्क था कि वाराणसी अदालत के आदेश के खिलाफ याची की पुनरीक्षण अर्जी खारिज हो चुकी है। कोर्ट ने आपत्ति को पोषणीय नहीं माना। इस आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 227 में याचिका पोषणीय नहीं है। याचिका खारिज की जाय।
कोर्ट इस मामले में अब तक 21 तारीखों पर सुनवाई कर चुका है। शुरू में न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने इसकी सुनवाई की। इसके बाद यह मामला न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ के समक्ष नियमित रूप से सुना गया। दोनों पक्षों की ओर से चली लंबी बहस के बाद सभी विचाराधीन याचिकाओं पर 28 नवंबर 2022 को फैसला सुरक्षित कर लिया गया था। कई मुद्दों को स्पष्ट करने के लिए फिर से सुनवाई होगी।
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