ईश्वर के दर्शन पवित्र मन से नहीं बल्कि पूर्ण सतगुरु की शरण से ही संभव हैं, जो दीक्षा के क्षण में ही प्रभु-दर्शन करा सकते हैं। इतिहास में अंगुलिमाल, गणिका, ठग आदि कई व्यक्तियों ने सतगुरु की शरण लेकर जीवन को परिवर्तित किया। इसी सत्य को आज आशुतोष महाराज ने अपने अंतरक्रांति प्रकल्प के माध्यम से जीवंत किया है। ये बातें साध्वी स्वाति भारती ने कहीं। वह दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के तत्वाधान में चौबेपुर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में प्रवचन कर रही थीं। प्रवचन में उन्होंने विदुर-सुलभा प्रसंग, उद्धव-विदुर भेंट एवं प्रभु श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया। संचालन साध्वी अनंता भारती ने किया। भजनों की मनमोहक प्रस्तुति साध्वी अभिनंदना भारती, साध्वी पद्मप्रभा भारती, साध्वी अंजलि भारती एवं साध्वी आरती भारती ने दी। शुभारंभ संस्थापक आशुतोष महाराज की आरती से हुआ। मुख्य यजमान पूर्वांचल के बड़े व्यवसायी चंद्रशेखर तिवारी मून बाबू, त्रिज्या तिवारी, संतोष बरनवाल, विनोद चतुर्वेदी, शारदा चतुर्वेदी ने विशिष्ट जनों का स्वागत किया।