बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग में प्रो. के थंगराज का सम्मान किया गया। संवाद
हालिया पद्मश्री पा चुके हैदराबाद के जीन वैज्ञानिक प्रो. के थंगराज का मंगलवार को बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग में भव्य स्वागत किया गया। कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत में प्राचीन डीएनए रिसर्च की सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां अरबों सैंपल उपलब्ध हैं लेकिन इनका कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। प्राचीन डीएनए सिर्फ अतीत नहीं बल्कि बीमारियों, आहार संबंधी आदतों और सदियों पुराने म्यूटेशंस का खजाना है। इन सवालों के जवाब के लिए भारत को और अधिक आधुनिक प्रयोगशालाओं की जरूरत है। आईआईटी धनबाद के वैज्ञानिक प्रो. दीपक झा ने कहा कि प्रयागराज और मिर्जापुर के बीच में बेलन घाटी की सभ्यता तो सव लाख साल पुरानी है मगर हाल ही में उन्हें वहां पर चारकोल मिला है जो करीब 55 हजार साल प्राचीन है। इससे यह पता चलता है कि यहां पर उसी समय से ही मानवों ने आग पर नियंत्रण का तरीका सीख लिया था। प्रो. झा ने इस मसले पर कई शोध कर चुके हैं और आईआईटी धनबाद में जियो-आर्कियोलॉजी कोर्स भी शुरू करा चुके हैं। सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी) के निदेशक प्रो. उल्लास कोलथुर-सीताराम ने कहा कि वे जैविक मानवशास्त्र के इस मिशन में पूरी तरह शामिल होने को तैयार हैं। इस दौरान डॉ. अभिशिक्त घोष रॉय, डॉ. शिव पटेल सहित कई वैज्ञानिकों की मौजूदगी रही।