गुरु की अवज्ञा जीवन में सदैव दुखदायी होती है। शिष्य का धर्म है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने गुरु का सम्मान करे। जैसे दूरबीन दूर की वस्तु को पास दिखाती है, वैसे ही प्रभु-स्मरण से भगवान हृदय के अत्यंत निकट अनुभव होते हैं। ये बातें इस्कॉन कोलकाता के कथावाचक एचजी सार्वभौम प्रभु ने कहीं। वह शुक्रवार को काशी आनंदम स्पिरिचुअल एंड वेलनेस वैदिक विलेज में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन प्रवचन कर रहे थे। व्यास-पीठ से सार्वभौम प्रभु ने कहा कि भक्ति कोई व्यापार नहीं है। जब भक्त बिना किसी मांग के भगवान की शरण लेता है, तभी उसका और उसके कुल का उद्धार होता है। कथा में हिरण्यकश्यप के पूर्व जन्म, वरदान, और भक्त प्रहलाद के अटूट विश्वास का भी सुंदर वर्णन हुआ। नाट्य प्रस्तुति में प्रेरणा कश्यप तथा बाल कलाकार भक्त प्रहलाद ने भावपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। उनके अभिनय और नृत्य-नाटिका को उपस्थित श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर सराहा। कथा के यजमान ज्योति विजय खेमका एवं जया खेमका हैं। कथा में उद्योगपति महेश सिंघानिया, डॉ. केके शर्मा उपस्थित रहे।