ज्ञान, भक्ति और वैराग्य तीनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। भक्ति को अक्सर ज्ञान और वैराग्य की जननी या माता के रूप में वर्णित किया गया है। जो इन दोनों को जन्म देती है। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को एक साथ होना चाहिए ताकि आध्यात्मिक उत्थान संभव हो सके। भक्ति को सभी गुणों का मूल माना गया है। ज्ञान हमें सही-गलत का बोध कराता है और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है। उक्त बातें वृंदावन से पधारे कथा व्यास गोरीलाल कुंज श्रीधाम के महंत स्वामी किशोरदास देव ने कहीं। वह शनिवार को श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार अंधविद्यालय दुर्गाकुंड में संकटमोचन संकीर्तन मंडल की ओर से चल रहे भक्तमाल कथा के छठवें दिन प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैराग्य का अर्थ भौतिक दुनिया से विमुख होना नहीं, बल्कि भावनात्मक बंधनों से मुक्त होना है। व्यासपीठ का पूजन आरती शिवकुमार एवं अखिलेश खेमका ने किया। इस अवसर पर विजय कुमार मिश्र, नीरज दुबे, बलदाऊ पाठक, श्याम अग्रवाल, सुशील अग्रवाल उपस्थित थे।