लहरतारा स्थित पूर्वोत्तर रेलवे वाराणसी मंडल के दो मंजिले कार्यालय के सिग्नल ड्राइंग विभाग में बुधवार की दोपहर भीषण आग लग गई। करीब घंटे भर की मशक्कत के बाद जब तक आग पर काबू पाया गया तब तक सिग्नलिंग सिस्टम के मानचित्र सहित कई महत्वपूर्ण फाइलें जलकर नष्ट हो गईं। फर्नीचर और लैपटॉप समेत लाखों की संपत्ति का नुकसान बताया जा रहा है। आग कैसे लगी, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। कारणों की जांच के लिए पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन ने टीम गठित कर दी है।
दोपहर करीब दो बजे जब अधिकारी-कर्मचारी लंच पर गए थे तभी डीआरएम कार्यालय के द्वितीय तल स्थित सिग्नल के ड्राइंग विभाग से धुआं उठता नजर आया। लोग दौड़कर पहुंचे तब तक कमरे में पूरा धुआं भर चुका था। कुछ देर बाद खिड़कियों से आग की लपटें उठने लगीं। आरपीएफ और कर्मचारियों ने आग पर काबू पाने का प्रयास किया लेकिन लपटें फैलने लगीं। करीब एक घंटे बाद दमकल की कई गाड़ियां मंडल कार्यालय पहुंचीं। घंटेभर बाद शाम करीब चार बजे आग पर काबू पाया जा सका। तब तक कार्यालय के अंदर रखे कागजात, कई महत्वपूर्ण फाइलें, फर्नीचर, लैपटॉप आदि जलकर राख हो गए।
सूत्रों की मानें तो कई स्टेशनों के सिग्नल सिस्टम के मानचित्र, कर्मचारियों और नई योजनाओं से जुड़े कई अहम कागजात भी जलकर नष्ट हो गए। मानचित्रों के जलने से स्टेशनों के सिग्नल सिस्टम में किसी तरह की खराबी आने पर उन्हें दुरुस्त करने में परेशानी होगी। हालांकि जनसंपर्क अधिकारी अशोक कुमार ने बताया कि सभी स्टेशनों पर सिग्नलिंग के मानचित्र की कॉपी रखी होती है। कोई बहुत दिक्कत नहीं होने पाएगी। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ महत्वपूर्ण कागजात, फाइलें और सामान जले हैं। आग के कारणों की जांच के लिए टीम गठित कर दी गई है।
पूर्वोत्तर रेलवे का वाराणसी मंडल कार्यालय। लहरतारा स्थित इस दो मंजिले कार्यालय भवन में डीआरएम सहित सभी प्रमुख अनुभागों के दफ्तर हैं। वाराणसी मंडल में पूर्वोत्तर रेलवे का पूरा दारोमदार संभालने वाले इस कार्यालय में आग से निबटने के इंतजामों की खस्ताहाली जानकर कोई भी हैरान रह जाएगा। बुधवार की दोपहर दो बजे जब कार्यालय के दूसरे तल से धुआं और लपटें उठीं तो मौके पर रेल कर्मियों और आरपीएफ के जवानों की भीड़ उमड़ पड़ी लेकिन तत्काल आग बुझाने के प्रबंध दुरुस्त न होने से एकबारगी कोई कुछ नहीं कर सका। आधे घंटे तक तो कर्मचारी और जवान बस इधर-उधर दौड़ते रह गए सिर्फ इस प्रयास में कि आग बुझाने के लिए घटनास्थल तक पानी पहुंचाया कैसे जाए।
उसके बाद भी जब कोई उपाय नहीं बन पाया तो कोई प्लास्टिक की बाल्टियों में पानी भरकर दौड़ा तो किसी ने गमले में सिंचाई के काम आने वाली पाइपों को आपस में जोड़कर पानी की बौछार शुरू की। इस पाइप से इतना प्रेशर ही नहीं बन पाया कि लपटों पर कुछ असर पड़ता। कुछ कर्मचारी फायर इस्टिंग्यूशर जरूर ढूंढ के ले आए लेकिन उनका भी निशाने चूकता दिखा। इस पूरी प्रक्रिया में एक घंटे गुजर गए। लपटें लगातार फैलती जा रही थीं। गनीमत यही रही कि उसके बाद फायर ब्रिगेड की गाड़ियां आ गईं और तब जाकर करीब घंटे भर की मशक्कत के बाद आग बुझाई जा सकी।
मौके के हालात को देख इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं था कि मंडल कार्यालय में अग्निशमन प्रबंधों के नाम पर निर्धारित मानक तक पूरे नहीं थे। मॉकड्रिल और प्रशिक्षण के नाम पर होने वाले आयोजनों की असलियत भी इस घटना में सामने आ गई। कार्यालय में बड़ी तादाद में एसी-कूलर सहित अन्य इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रानिक उपकरण लगे हैं। आग थोड़ी और फैलने पाती तो हालात संभाल पाना बेहद मुश्किल हो जाता। इतने महत्वपूर्ण और बड़े कार्यालय में बालू भरी बाल्टियां, फायर हाइड्रेंट, ऐसी इमरजेंसी के लिए अलग से पानी की टंकी जैसी अग्निशमन की बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया न होना भी एक बड़ा सवाल खड़ा कर गया। कार्यालय के जिस सिग्नल ड्राइंग विभाग में आग लगी, उसके कमरे की दीवारें तक चिटक गई हैं।
जब फायर ब्रिगेड अटकी प्रवेश द्वार में
वाराणसी। आग की सूचना पर डीरेका से चली दमकल गाड़ी मंडल कार्यालय के प्रवेश द्वार पर आकर अटक गई। अब अन्य दमकल गाड़ियों के प्रवेश पर भी संकट खड़ा हो गया। हालांकि दूसरा गेट भी है लेकिन वह इतना संकरा है कि बड़ी मुश्किल से छोटी गाड़ी प्रवेश कर पाई। हालांकि उसके बाद परिसर के बाहर से ही खड़ी दमकल गाड़ियों से लंबी-लंबी पाइपों के जरिये पानी का छिड़काव कर आग बुझाने की मशक्कत शुरू कर दी गई।
बगल में ही है कंट्रोल कार्यालय
जिस बिल्डिंग में आग लगी थी, उसी से सटा कंट्रोल कार्यालय है। जहां से वाराणसी मंडल और इस क्षेत्र से गुजरने वाली ट्रेनों की मॉनीटरिंग की जाती है। ट्रेनों पर नजर रखे जाने के साथ ही आवश्यक दिशा निर्देश निर्गत किए जाते हैं। कहीं आग इस कार्यालय तक पहुंचती तो रेलवे को बड़ा नुकसान हो सकता था।