नाम अंबिका... उम्र लगभग 74 साल... पता बिहार का गोपालगंज... और हत्या के जुर्म में सेंट्रल जेल की सलाखों के पीछे गुजर गए जिंदगी के 50 साल। अब न तो अंबिका को किसी का इंतजार है और ना ही उसके घर से कोई मिलने आता है। बेहद खामोश और खुद में खोया रहने वाला अंबिका जब कभी चिंतित होता है तो साथी कैदियों से पूछता है कि क्या उसकी मौत जेल की ऊंची चहारदीवारी के भीतर होगी या फिर वह बाहर मरेगा। आजीवन कारावास और इस संबंध में रिहाई को लेकर स्पष्ट प्रावधान न होने पर सलाखों के पीछे 60 ऐसे कैदी हैं जो 20 साल से अधिक की सजा काट चुके हैं मगर वो कब बाहर आएंगे, बताने वाला कोई नहीं।
आम धारणा है कि आजीवन कारावास मतलब 14 साल की सजा मगर हकीकत में ऐसा नहीं है। इस संबंध में प्रदेश सरकार के नियम भी स्पष्ट नहीं हैं। आखिरी बार 2011 में 60 साल से अधिक आयु के आजीवन कारावास की सजा पाए उन कैदियों को रिहा किया गया था जो 16 साल की सजा काट लिए थे। सेंट्रल जेल प्रशासन के अनुसार 14 साल से अधिक की सजा काट रहे 360 कैदी वर्तमान में निरुद्ध हैं। इनमें से 63 ऐसे हैं जो 70 साल से अधिक उम्र के हैं। जबकि 70 साल से अधिक आयु के कैदियों की कुल संख्या 221 है। सेंट्रल जेल के वरिष्ठ जेल अधीक्षक संजीव त्रिपाठी ने बताया कि सरकार की ओर से इस संबंध में स्पष्ट प्रावधान न होने पर हम कैदियों को नहीं छोड़ सकते हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ता श्रुति नागवंशी का कहना है कि सरकारों की अनदेखी के कारण सालों से लोग कैद हैं। कई कैदियों से तो उनके घर वाले भी मिलने नहीं आते हैं और कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं। मानवाधिकार आयोग और संगठनों ने कई बार सरकारों के सामने बात रखी लेकिन गंभीरता से नहीं लिया गया। आखिरकार 70 वर्ष का शख्स समाज में आएगा तो कौन सा अपराध करेगा। नीति निर्धारकों को गंभीरता से सोचकर अधिक आयु के कैदियों के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।