वाराणसी। डीरेका प्रशासन के फरमान ने एक बार फिर हड़कंप मचा दिया है। सीएमई के बजाय सीईई को कारखाने की जिम्मेदारी दे दी गई है। इससे मकैनिकल से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियाें की नाराजगी के साथ-साथ चिंता बढ़ गई है। आशंका है कि धीरे-धीरे मकैनिकल स्टाफ की जरूरत को कम करने के साथ ही इनकी शिफ्टिंग की योजना के तहत ऐसा किया जा रहा है। इस संबंध में संयुक्त कर्मचारी परिषद के पदाधिकारियों ने रेल मंत्री, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और डीरेका महाप्रबंधक को पत्र भी भेजा है।
डीरेका में लगभग 6000 कर्मचारी हैं। डीजल रेल इंजन बनाने में डीरेका ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। कारखाने की कमान अभी तक सीएमई (मुख्य यांत्रिक अभियंता) के हाथ में रही है। 24 नवंबर को डीरेका महाप्रबंधक रश्मि गोयल ने यह जिम्मेदारी सीईई (मुख्य इलेक्ट्रिकल इंजीनियर) को सौंप दी। डीरेका में ज्यादातर अधिकारी व कर्मचारी यांत्रिक के हैं। सीईई को कारखाने की कमान मिलने से यांत्रिक कर्मियों में रोष है।
डीजल इंजन उत्पादन का लक्ष्य कम करने और इलेक्ट्रिक इंजनों के उत्पादन का लक्ष्य बढ़ाने के कारण मकैनिकल कर्मचारी पहले से ही सशंकित हैं। पिछले सप्ताह ही रेल मंत्री पीयूष गोयल और रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के आश्वासन पर कर्मचारी शांत हुए थे। अब महाप्रबंधक के नए फरमान पर कर्मचारियों का कहना है कि डीरेका को निजीकरण की ओर ढकेला जा रहा है। 26 अक्तूबर को अचानक 400 इलेक्ट्रिक इंजन के उत्पादन का लक्ष्य दे दिया गया, जो असंभव है। लक्ष्य हासिल न होने पर बड़े-बड़े टेंडर निजी कंपनियों को दिए जाएंगे और कई पोस्ट खत्म कर दी जाएंगी।