वहीं दूसरी तरफ डमरू दल के लोगों ने डमरू निनाद से माता के चरणों में श्रद्धा अर्पित की। इसके बाद हर-हर महादेव के जयघोष के बाद सभी ने एक साथ कुंड के सिद्ध जल में आस्था की डुबकी लगाई। इसके बाद तो पुण्य बटोरने के लिए स्नान करने वालों की होड़ लग गई। हर कोई कुंड में डुबकी लगाकर माता मणिकर्णिका से पुण्य की कामना कर रहा था।
पुजारी ने बताया कि मान्यता है कि मणिकर्णिका माई के स्नान से तीर्थ कुंड का जल अगले एक वर्ष के लिए सिद्ध हो जाता है और इसी जल में स्नान करने से श्रद्धालुओं के पाप दूर होते हैं। माना जाता है कि मणिकर्णिका मां की अष्टधातु की प्रतिमा प्राचीन समय में इसी कुंड से निकली थी। ढाई फीट ऊंची यह प्रतिमा वर्ष भर ब्रह्मनाल स्थित मंदिर में विराजमान रहती है। सिर्फ अक्षय तृतीया को दर्शन के लिए प्रतिमा कुंड स्थित 10 फीट ऊंचे पीतल के आसन पर विराजमान कराई जाती हैं। माता की शोभायात्रा मंदिर से कुंड तक निकाली जाती है।