उम्र का वह पड़ाव जब हिम्मत और उत्साह दोनों ही कम होने लगते हैं, अकेलापन निराशा को और गाढ़ा करता जाता है, जिंदगी के उस ढलान पर अकेलेपन को ही नियति मानकर जीने वाले बहुत हैं लेकिन इन दो बहनों की बात इससे हटकर है। 68 साल की आशा और 65 की अरुणा, दोनों बहनें उम्र को पीछे छोड़ जिंदगी को नई दिशा देने में जुटी हैं। हमसफर का साथ छूटा। बेटे-बेटियां दूसरे शहरों में शिफ्ट हो गए। अकेलेपन और निराशा को मात देने की कोशिश में दोनों बहनों की ओर से शुरू किया गया होम स्टे का बिजनेस आज उनकी आजीविका का तो सहारा है ही, अतिथियों के रूप में परिवार की नित नई खुशियां भी उनके हिस्से में हैं।
उन्होंने अपने होम स्टे बिजनेस को नाम दिया है ‘ग्रैनीज इन’ (दादी-नानी का घरौंदा)। बाकायदा इसकी वेबसाइट बनाई है। उसी के जरिये बुकिंग होती है। अतिथियों को अपने आशियाने में ठहरने और भोजन-पानी के सभी प्रबंध मुहैया कराती हैं वह भी बिल्कुल अपने घर जैसे माहौल में। यहां आने वाले हर इंसान को, चाहे वो भारतीय हो या विदेशी, उसे बिल्कुल घर जैसा माहौल मिलता है। इंटीरियर और बाकी सुविधाएं भी घर जैसी ही।
रामापुरा स्थित अपने ‘ग्रैनीज इन’ पर मिलीं आशा सिंह बताती हैं कि हम और अरुणा दोनों चचेरी बहनें हैं। परिवार मूलत: पटना का रहने वाला है। अरुणा अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं और रामापुरा स्थित मकान पर ही वह शुरू से रही हैं। पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियों में समय बीतता गया। अरुणा के एक पुत्र और पुत्री है, दोनों दूसरे शहरों में अपने परिवार के साथ हैं। आशा की बेटी शिल्पी गुड़गांव में पति के साथ रहती हैं। जबकि भाई पैरालाइसिस के बाद से अस्वस्थ है।
इन चुनौतियों के बीच अकेलेपन और निराशा से निजात पाने और आर्थिक नजरिये से आत्मनिर्भर बनने के लिए कुछ वर्षों पहले आशा और अरुणा ने होम स्टे बिजनेस की यह योजना सोची। गुड़गांव में रहने वाली आशा की बेटी शिल्पी और उनके पति ने पूरा साथ दिया। अरुणा बताती हैं कि यहां आने वाले हर शख्स से परिवार के सदस्यों जैसा नाता बंध जाता है। अतिथियों को घर जैसा माहौल मिलता है और हमें अपना सा कोई परिवार। समय कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता।