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सौरमान और चंद्रमान के सामंजस्य के लिए है अधिमास

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वाराणसी। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य मधुसूदन मिश्र ने कहा कि अधिमास ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में सर्वदा से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय रहा है। नवविध कालमानों के अन्तर्गत सौरमान एवं चन्द्रमान के सामंजस्य हेतु इसकी व्यवस्था अनेक वैज्ञानिक एवं सैद्धांतिक रुप से की गई है। वह शुक्रवार को अधिमास के ज्योतिषीय विश्लेषण पर विचार व्यक्त कर रहे थे। डॉ. मिश्र ने कहा कि सौरमान के अनुसार सूर्य की एक संक्रांति से द्वितीय अमावस्या को चन्द्रमास कहा जाता है। द्वादश संक्रान्तिजन्य सौरमास का एक सौरवर्ष तथा द्वादश चंद्रमास का एक चन्द्रवर्ष होता है। एक अमावस्या से द्वितीय अमावस्या के मध्य में अर्थात प्रत्येक चन्द्रमास की सूर्य की मेष, वृष आदि राषियों में संक्रांति में चन्द्रमास मान्य होता है। संक्रांति उपलक्षित मास के मान्य होने के कारण संक्रांतिविहीन चंद्रमास को अधिमास की संज्ञा दी गई है। दो संक्रान्तियुक्त चन्द्रमास को क्षयमास कहा जाता है। डॉ. मिश्र ने कहा कि सैद्धांतिक दृष्टि मध्यमास के अनुसार एक चन्द्रमास लगभग 29 दिन 31 घटी 50 पल 7 विपल तथा 30 विपल का होता है अर्थात एक चंद्रवर्ष 354 दिनों का होता है। गणितीय प्रमाणों के अनुसार एक महायुग में 1593336 अधिमास होता है इस वर्ष अश्विन मास अधिकमास है जो 18 सितंबर से 16 अक्तूबर तक रहेगा। अश्विन मास में अधिमास की स्थिति 19 वर्षों बाद बन रही है। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कहा कि अधिमास की यह व्यवस्था निश्चित रूप से हमारी सनातन वैदिक ज्ञानपरंपरा की वैज्ञानिकता को स्पष्ट करती है।
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