हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा एवं विद्याश्री न्यास वाराणसी का संयुक्त आयोजन बृहस्पतिवार को अर्दली बाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में हुआ। इसमें पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित शृंखला के द्वादश पुष्प के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के अवदान पर चर्चा हुई। बसंत महिला महाविद्यालय हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष एवं व साहित्यकार प्रो. शशिकला त्रिपाठी ने कहा कि आचार्य द्विवेदी आलोचना की नई परंपरा में प्रमुख थे। बड़ा लेखक वही होता है जो अपने समकालीन को ही नहीं, अगली पीढ़ी को भी प्रभावित करें। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की पूर्व प्रोफेसर प्रो. कल्पलता पांडेय ने कहा कि कला एवं नाटक के क्षेत्र में पंडित हजारी की नवीन सृजनात्मकता उन्हें अत्यंत विशिष्ट बनाती है। अध्यक्षता डॉ. भगवंती सिंह ने की। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने की। स्वागत विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने किया। संचालन डॉ. मंजरी पांडेय तथा धन्यवाद प्रकाश नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया। इस अवसर पर प्रकाश उदय, डा. राम सुधार सिंह, प्रभात झा, शिवकुमार पराग, कवींद्र नारायण, ओम धीरज, पवन कुमार शास्त्री, सुरेंद्र वाजपेई, अशोक कुमार सिंह आदि मौजूद रहे।