ज्ञानपुर। ‘मछली की दोनों आंखों के बीच में माथे पर तीसरी आंख भी होती है, जो ब्रेन के लिए उसकी किडनी का काम करती है। उसके जरिए कोई भी मैसेज फिल्टर होकर सीधे ब्रेन तक चला जाता है। इसके इस्तेमाल से अगर कोई दवा बने तो वह स्पाइनल कार्ड से जुड़ी बीमारियों में बेहद कारगर साबित होगी...।’ अपनी इस थ्योरी के जरिए जापानियों तक को सोचने पर विवश कर देने वाले भदोही जिले के शिक्षक को ‘शिक्षक दिवस’ के मौके पर एक सैल्यूट तो बनता है। अध्ययन-अध्यापन के साथ वह पर्यावरण संरक्षण के लिए अब भी समर्पित हैं। बात हो रही है कृषि रसायनों एवं कालीन उद्योग रसायनों के पर्यावरण पर प्रभाव, मत्स्य मस्तिष्क और अंत:स्रावी ग्रंथि विज्ञान के अध्ययन एवं शोध के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा प्राप्त कर चुके जिले के वरिष्ठ शिक्षक डॉ. विष्णु मोहन सहाय श्रीवास्तव की। केएन पीजी कॉलेज के पूर्व रीडर एवं प्राणि विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्रीवास्तव के निर्देशन में 19 शोध छात्र-छात्राओं ने पीएचडी की उपाधि हासिल की, जबकि दो छात्र शोधरत हैं। मछली की तीसरी आंख पर शोधकार्य के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने डॉ. श्रीवास्तव को 2011 में वरिष्ठ शिक्षक सम्मान से नवाजा था। इस विषय पर उनका शोध कार्य अब भी जारी है। उन्होंने कॉलेज की प्रयोगशाला में 40 वर्षों तक कृषि रसायनों और कालीन रसायनों का पर्यावरण पर प्रभाव पर मुख्य अनुसंधानकर्ता के रूप में कार्य किया। उन्होंने चार पुस्तकों का प्रकाशन किया, जबकि 63 से अधिक शोधपत्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। वह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के विषय विशेषज्ञ के रूप में मान्य सदस्य भी रह चुके हैं। कनाड़ा, जापान समेत कई देशों में वक्तव्य के लिए आमंत्रित किए जा चुके डॉ. श्रीवास्तव को जापान की हिताची कंपनी ने कानफोकल-488 ग्रीष्मकालीन गोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जो किसी भारतीय के लिए विशिष्ट सम्मान माना जाता है। डॉ. श्रीवास्तव की शैक्षिक उपलब्धियों से प्रभावित होकर जापान के दो प्रोफेसर नगोया विश्वविद्यालय के डॉ. वाई ओमुरा, मियाजाकी विश्वविद्यालय के डॉ. एम मकाटो और ब्राजील की शोध छात्रा ई. फुरकावा ने उनकी प्रयोगशाला में 15 दिन रह कर शोध कार्य किया। नगोया विश्वविद्यालय में मछली की तीसरी आंख की अपनी थ्योरी को उन्होंने प्रभावशाली ढंग से रखा, जिससे जापानी हैरत में पड़ गए।