जंगीगंज। एक ऐसा मंदिर जो अनोखा है, अदभुत है और सबसे बड़ी बात की कुएं जैसी गहराई में है। राष्ट्रीय राजमार्ग से तेरह किमी दक्षिण गंगा तट पर स्थित ये मंदिर उन बारह शिवलिंगों में तो नहीं है, लेकिन इस मंदिर का अपना एक अलग महत्त्व है। भोले भंडारी का यह मंदिर है सेमराध नाथ के नाम से प्रसिद्ध है। कुए के इस मंदिर के कई ऐतिहासिक महत्व है। सावन में यहां शिवभक्तों संग श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि द्वापर युग में पुंडरीक नाम का एक राक्षस काशी का राजा हुआ करता था और वह अपने आप को स्वयं भगवान् श्री कृष्ण कहा करता। पुंडरीक के बारे में जब भगवान श्रीकृष्ण को पता चला तो वह क्रोधित हुए। भगवान श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र काशी की तरफ चला दिया और चारों तरफ हाहाकार मच गया। पुंडरीक मारा गया लेकिन सुदर्शन चक्र से काशी धूं-धूंकर जलने लगी। सभी देवों ने मिलाकर एक प्रस्ताव रखा कि एक तरफ से भगवान कृष्ण सुदर्शन चलाएं और दूसरे तरफ से शिव जी अपना त्रिशूल चलाएं। त्रिशूल और चक्र आपस में टकराकर यहीं सेमराध में गिरा जहां कुएं जैसी गहराई हो गई। उस दौरान एक व्यापारी नाव से अपना सामन ले कर जा रहा था कि अचानक उसकी नाव यही गंगा में फंस गई। व्यापारी वहीं सो गया, रात में शिव जी ने दर्शन दिया और खुदाई कराने को कहा। खुदाई के दौरान उसे शिव जी का शिवलिंग दिखा, लेकिन उस लिंग के वे जितना पास पहुचते वो उतना ही नीचे चला जाता। इसका उल्लेख पद्म पुराण और श्रीमद भागवत में भी मिलता है। पूरे सावन माह यहां दर्शन करने वालों का तांता लगा रहता है। श्रद्धालु गंगा में स्नान कर भोलेनाथ के इस अतुलनिय स्वरुप का दर्शन करते हैं।