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गंगा तटों-कुंडों पर जीवित्पुत्रिका व्रत का रेला मेले में तब्दील

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वाराणसी। काशी बुधवार को पुत्र कामना के लिए और अनूठे लोकोत्सव की साक्षी बनी। कुंडों, गंगा तटों से लेकर बीच सड़कों तक गन्ने के मंडप सजाए गए। गंगा की मिट्टी से वेदिया बनाकर हल्दी-चंदन की अल्पनाएं सजाई गईं। फूलों, फलों के अलावा तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया गया। कहीं शहनाई की मंगलध्वनि गूंजी तो कहीं बैंडबाजा बजा। यह नजारा था जीवित्पुत्रिका व्रत रखने वाली महिलाओं के समूहों के बीच उमड़ी आस्था का। निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं ने पुत्र कामना को लेकर सोरहिया मेला के आखिरी दिन जीवित्पुत्रिका व्रत रखकर समूहों में पूजा की। इस दौरान बुजुर्ग महिलाओं से पौराणिक कहानियां सुनी गईं। सोरहिया मेला के आखिरी दिन लक्ष्मीकुंड पर जीवित्पुत्रिकता व्रत करने के लिए महिलाओं का तांता दोपहर 12 बजे से ही लगना शुरू हो गया था। दोपहर बाद तीन बजे तक कुंड पर वेदी बनाने के लिए जब जगह नहीं बची तब बांस की डेलिया में पूजा का सामान सजाकर बाजे गाजे के साथ आने वाले महिलाओं का समूह लक्सा तिराहे से लेकर जद्दूमंडी और गुरुबाग की सड़कों पर ही वेदियां बनाने में जुट गए। बीच सड़क पर व्रती महिलाओं और उनके परिजनों की भीड़ उमड़ने से गुरुबाग-लक्सा-जद्दूमंडी मार्ग पर यातायात पूर्ण रूप से ठप हो गया। इन सड़कों पर पैदल चलने की भी जगह नहीं थी। शाम चार बजे तक जद्दूमंदी, लक्सा तिराहा से लक्सा रोड, गुरुबाग तक की सड़कों पर सिर्फ व्रती महिलाओं की बनाई गई वेदियां और गन्ने के मंडप ही नजर आने लगे। महिलाओं ने हल्दी, रोली से टीक कर वेदियां बनाई । फिर आठ फल, आठ तरह की मिठाई, अनाज रखकर जीवित्पुत्रिका की आराधना की। इस दौरान सड़कों, कुंडों पर हल्दी की अल्पनाएं भी बनाई गई थीं। पूजा करने वाली महिलाएं समूहों में कहानियां भी सुन रही थीं। इस दौरान पुत्रों-पुत्रियों के नाम पर सोने-चांदी के चंद्रमा की भी पूजा की गई। धागे भी पूजकर बच्चों को गले में पहनाए गए। अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, अहिल्याबाई घाट, शीतला घाट, भैंसासुर घाट के अलावा डीरेका सूर्य सरोवर पर बड़ी तादाद में व्रती महिलाओं ने जीवित्पुत्रिका व्रत रखकर आराधना की।
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