सेवापुरी । एक आदमी रोटी बेलता है, दूसरा आदमी रोटी खाता है, तीसरा आदमी है जो रोटी न बेलता है और न ही रोटी खाता है, बल्कि रोटी से खेलता हैं, मैं पूछता हूं यह तीसरा आदमी कौन है, मेरे देश की संसद मौन है। देश को आजादी मिलने के बाद भी धूमिल हमेशा व्यवस्था परिवर्तन के खिलाफ थे। जनकवि धूमिल अपनी कविताओं में आम भाषा का उपयोग करते थे। कवि धूमिल का जज्बा इतना बुलंद था कि लोग उनसे जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। धूमिल सत्ता के नाइंसाफी फरमान से काफी आहत थे। वह अमीरी और गरीबी की खाई को पाटने के पक्षधर भी थे। धूमिल अन्याय की लड़ाई अपने कविताओं के माध्यम से लड़ते थे। जंसा थाना क्षेत्र के उनके पैतृक गांव खेवली में बुधवार को जनकवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ की 82 वी जयंती मनाई गई। कार्यक्रम का आयोजन धूमिल स्मृति शोध संस्थान के तत्वावधान में संपन्न हुआ। जयंती समारोह के अवसर पर हिंदी साहित्य से जुड़े तमाम विद्वानों एवं कवियों ने धूमिल की कविताओं को पढ़कर उन्हें याद किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रयागराज हिंदुस्तान अकादमी के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह ने धूमिल के चित्र पर पुष्प अर्पित किया। कार्यक्रम में डॉ. ओम धीरज, प्रो. श्रद्धानंद सिंह, डॉ. रामसुधार सिंह. प्रो. दीपक शर्मा. डॉ. वाचस्पति. आचार्य रामेश्वर त्रिपाठी, कन्हैया पांडेय, विरेन्द्र मिश्रा, नंदलाल मास्टर, दीपक उपाध्याय, मोहन कुमार झा के साथ धूमिल की पत्नी मूरता देबी पुत्र रत्न शंकर पांडेय, आनंद शंकर पांडेय मौजूद रहे। इस अवसर पर मेधावी छात्र विकास कन्नौजिया को धूमिल गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया।