एनसीएल की कोयला खदानों में कार्य कर रही आउटसोर्सिंग कंपनियों में रिटेल का रियायती डीजल खपाने का कार्य इधर करीब छह माह से चल रहा है। पहली बार आपूर्ति महकमे की नजर इस धंधे पर पड़ी है। इससे पहले इसी तरह के मामले में सीबीआई ने साल 2013 में एनसीएल की कई आउटसोर्सिंग कंपनियों में छापेमारी की थी।
तेल के नए खेल की शुरुआती जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। पता चला कि चंदौली स्थित किसान सेवा केंद्र (केएसके) से दो-दो हजार लीटर डीजल वाली एक चालान पर्ची (कैश मेमो) पर टैंकर के कई चैंबरों में हजारों लीटर डीजल भरा जाता था। बुधवार को शक्तिनगर में पकड़े गए टैंकर में 25 हजार लीटर डीजल मौजूद होने का दावा अधिकारियों ने किया है।
इसकी जांच की जा रही है कि इस तरह पंप से टैंकरों का चैंबर भरा जाना नियम के अधीन है या विरुद्ध। तेल कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि इसी साल मार्च में सरकार ने कंज्यूमर व रिटेल के लिए डीजल मूल्य का नए तरीके से निर्धारण किया गया था। इसी के बाद धंधा चटख हुआ। दावा किया जा रहा है कि इस कारोबार से ऑयल कंपनियों व एनसीएल को चपत लगी।
एनसीएल की यूपी व एमपी के सीमांचल क्षेत्र में दस कोयला खदानें हैं। सभी खदानों में आउटसोर्स के जरिये अधिभार हटवाने का कार्य कराया जा रहा है। अधिभार हटाव कार्य के लिए हजारों करोड़ रुपये के ठेके दिए गए हैं। करीब सभी आउटसोर्सिंग कंपनियों के परिसर में आयल कंपनियों ने कंज्यूमर श्रेणी का पंप स्थापित किया है। इसके विपरीत आउटसोर्सिंग कंपनियां खुदरा बिक्री (रिटेल) का सस्ता डीजल हासिल करने में जुटी हैं।
कंज्यूमर व रिटेल डीजल के मूल्य का अंतर भुनाने के साथ कंपनियां यूपी व मध्यप्रदेश के डीजल रेट का भी भरपूर फायदा उठा रही हैं। यूपी में डीजल सस्ता तो मध्य प्रदेश में कई रुपये मंहगा है। इसी खेल को आपूर्ति महकमा कालाबाजारी मान रहा है। दुद्धी के आपूर्ति निरीक्षक निर्मल सिंह ने बताया कि हालिया मामले में केस दर्ज हो गया है। जांच की कार्रवाई चल रही। इस मामले में कहां और किस तरह गड़बड़ी हुई यह जांच के बाद स्पष्ट होगा।