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Sonebhadra News: तेजी से घटता जा रहा वन, खतरे में जीवन

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सोनभद्र। पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद जिले में वन क्षेत्र लगातार कम होता जा रहा है। हरे पेड़ों की कटान धड़ल्ले से जारी है। भारतीय वन सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में ही जिले में करीब 103 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हो गया है। यह स्थिति तब है, जब हर साल वन विभाग लाखों नए पौधे भी लगा रहा है। तेजी से घटता वन क्षेत्र भविष्य के बड़े संकट का संकेत है। बावजूद लोग इसके प्रति सजग नहीं हो रहे।
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सोनभद्र की पहचान यहां के घने जंगल और पहाड़ों से ही है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर जिले में वनों की सुरक्षा के लिए वन विभाग के तीन प्रभाग के अंतर्गत सैकड़ों अधिकारी-कर्मचारी काम कर रहे हैं। बावजूद वन बचाने में नाकाम हैं। भारतीय वन सर्वे की ओर से प्रत्येक दो वर्ष में कराए जाने वाले सर्वे की रिपोर्ट पिछले साल जारी हुई थी। इस रिपोर्ट के अनुसार करीब 6905 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्रफल वाले इस जिले में वर्ष 2019 में वन क्षेत्र का दायरा 2540.29 वर्ग किमी था। वर्ष 2021 के सर्वे में यह घटकर 2436.75 वर्ग किमी रह गया है। इस तरह यहां करीब 103.54 वर्ग किमी वन क्षेत्र में कमी आई है। इसमें भी 138.32 वर्ग किमी में घने जंगल हैं जबकि 1357.81 वर्ग किमी में खुला वन क्षेत्र है। शेष 940 वर्ग किमी से अधिक के दायरे में मध्यम श्रेणी का वन है। इससे इतर वन विभाग के आंकड़ों में पिछले चार वर्षों में दो करोड़ से अधिक पौधे अभियान चलाकर रोपे गए हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों ने अपने स्तर से भी पौधरोपण किया है। बावजूद सर्वे की यह रिपोर्ट विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है।
तेजी से नगरीकरण ने बढ़ाई चुनौती
वन क्षेत्र कम होने के पीछे तेजी से हो रहे नगरीकरण को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। कुछ वर्षों पहले तक जो इलाके जंगल हुआ करते थे, आज वहां नई कॉलोनी विकसित हो चुकी हैं। नए मकानों का निर्माण हो रहा है। यह प्रक्रिया निरंतर बढ़ रही है। पेड़-पौधों की बजाय क्रंक्रीट के जंगल में तब्दील होने का असर यहां के पर्यावरण पर पड़ रहा है। हाल यह है कि सबसे ज्यादा वन क्षेत्र होने के बावजूद प्रदेश के सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्र में भी सोनभद्र की गिनती होती है।
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कोरोना ने बताई महत्ता, फिर भी नहीं जागे हम
कोरोना महामारी के दौरान लोगों को कृत्रिम ऑक्सीजन की व्यवस्था करनी पड़ी थी। इसकी उपलब्धता के अभाव में हजारों लोगों ने जान भी गंवाई। इतनी भयावह स्थिति के बावजूद वनों की सुरक्षा को लेकर लोग सतर्क नहीं हो रहे। न ही सरकारी स्तर पर कोई ठोस प्रयास किया जा रहा है।
वनों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए निरंतर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। प्रदूषण रोकने के लिए भी नए कदम उठाए जा रहे हैं। अभियान चलाकर पौधरोपण किया जा रहा है। पौधों के पेड़ बनने में वक्त लगता है। सर्वे में वन क्षेत्र कम होने का यह भी एक कारण हो सकता है। - सुरेश पांडेय, डीएफओ राबर्ट्सगंज।
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