उपचार के लिए ले जाते समय पिता की मौत हो गई। इस तहरीर पर पुलिस ने केस दर्ज किया। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं के तर्कों को सुनने, गवाहों के बयान व पत्रावली का अवलोकन करने पर उच्चतम न्यायालय की विधि व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि दंडादेश कठोर होना चाहिए।
अनुचित उदारता एवं सहानुभूति न्याय को अपेक्षाकृत अधिक क्षति पहुंचाते हैं। दोषसिद्ध हो जाने के बाद दोषी को उसे पर्याप्त दंड से दंडित न करने से न्याय की घोर क्षति होती है। सहानुभूति प्रकट करके अगर अभियुक्त को विधि की ओर से प्रावधानित सम्यक दंड से पर्याप्त रूप से दंडित न किया जाए तो इससे सामान्य जन का विश्वास भी प्रभावित होता है।
इसका अनुपालन करते हुए कोर्ट ने दोषी बहू सुखवंती को उम्रकैद व 10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड न देने पर 4 माह की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी। जेल में बिताई अवधि सजा में समाहित की जाएगी।