सोनभद्र। यूपी के आदिवासी बहुल जिले में बचपन कुपोषण की चपेट में है। यहां 0-5 वर्ष की आयु में हर चौथा बच्चा बौनेपन का शिकार है। उम्र के साथ उनकी लंबाई नहीं बढ पा रही है। इसमें सिर्फ गरीब और ग्रामीण के अलावा नगरीय क्षेत्र के सामान्य परिवारों के बच्चे भी हैं। ज्यादातर अभिभावकों को बच्चे की इस कमी के बारे में पता भी नहीं है। इसका असर बच्चों के मानसिक विकास पर भी पड़ रहा।
बच्चों में स्वास्थ्य और पोषण का स्तर जांचने के लिए उनकी उम्र के अनुसार लंबाई और वजन की जांच की जाती है। इसी आधार पर तय होता है कि उनका सही विकास हो रहा है या नहीं। सोनभद्र में पांच वर्ष से कम आयु की संख्या 1.96 लाख है। इसमें करीब 50 हजार बच्चे ऐसे हैं, जिनकी उम्र के अनुसार लंबाई नहीं बढ रही है। यह बच्चे बौनेपन के शिकार हैं। बाल विकास विभाग के मुताबिक ऐसे अधिकांश बच्चे आदिवासी परिवारों के हैं, जिन्हें पर्याप्त पोषण युक्त आहार नहीं मिल पा रहा। हालांकि नगरीय और सुविधा संपन्न परिवारों के बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। उन्हें भोजन तो मिल रहा है, लेकिन पोषण पाने से वंचित हैं। बौनेपन के शिकार इन बच्चों को कुपोषित श्रेणी में रखकर निगरानी की जा रही है। डॉक्टरों के मुताबिक, शारीरिक विकास में पिछड़े ये बच्चे दूसरे बच्चों की तुलना में मानसिक विकास में भी पिछड़ रहे हैं। इसका असर इनके भविष्य पर पड़ रहा है।
उम्र और लंबाई का यह है मानक (सेमी में)
उम्र: लड़का: लड़की
जन्म: 45: 43
एक वर्ष: 74: 71
दो वर्ष: 81: 79
तीन वर्ष: 94: 91
चार वर्ष: 101: 99
पांच वर्ष: 106: 104
इन कारणों से नहीं बढ पा रहे बच्चे
उम्र के अनुसार बच्चों की लंबाई न बढ़ने के पीछे सही खुराक न मिलना एक प्रमुख वजह है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के कारण मां-बाप बच्चों को पोषणयुक्त खुराक नहीं दे पा रहे हैं। बच्चे सिर्फ सामान्य भोजन के भरोसे हैं। दूरदराज के इलाकों में आंगनबाड़ी केंद्रों से मिलने वाला पूरक आहार भी सही मात्रा में बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इस कारण बच्चों का विकास प्रभावित है। साधन संपन्न परिवारों में बच्चों को पौष्टिक आहार के बजाय अभिभावक चिप्स, नूडल्स, फास्टफूड आदि थमा रहे हैं। इससे बच्चों का पेट तो भर रहा, लेकिन सही पोषण नहीं मिल पा रहा है।
यह करना जरूरी
जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रशांत शुक्ला के मुताबिक बच्चों के विकास के लिए शुरुआत के दो साल काफी अहम होते हैं। जन्म के बाद छह माह तक बच्चों को सिर्फ मां का दूध ही पिलाएं। इस अवधि के बाद ही उन्हें अतिरिक्त आहार देना चाहिए। फास्ट फूड के बजाय उन्हें पोषण युक्त भोजन दें। खाने में दूध, दलिया, हरी सब्जी, फल आदि शामिल करें। उन्हें खेलकूद सहित अन्य शारीरिक गतिविधियों से जोड़ें। केवल वीडियो गेम्स, मोबाइल फोन पर निर्भर न रहने दें। उनका सभी टीकाकरण कराएं।
जिले के 26 प्रतिशत बच्चों में बौना या नाटापन की समस्या है। सही पोषण न मिलना इसकी एक वजह है। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के माध्यम से ऐसे बच्चों की पहचान कराकर उनके अभिभावकों को जागरूक किया जा रहा है, ताकि बच्चों को संपूर्ण पोषण मिले और उनका सही विकास हो सके। -राजीव सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी।