जिले के परिषदीय स्कूलों को संवारने के लिए शुरू हुआ ऑपरेशन कायाकल्प कागजों पर पूरा हो रहा है। लाखों रुपये खर्च के बाद भी अधिकांश स्कूल तय 19 बिंदुओं पर संतृप्त नहीं हो सके हैं। जंगल के बीच पगडंडी से होकर बच्चे प्राथमिक विद्यालय घसिया बस्ती पहुंचते हैं।
कहीं बिजली नहीं पहुंची तो कहीं शौचालय नहीं है, बाउंड्री, हैंडवाश यूनिट का काम अधूरा है। जिला मुख्यालय क्षेत्र में दो तत्कालीन बीएसए के गोद लिए गए परिषदीय स्कूल में कई खामियां हैं। बावजूद कागजों में अभियान को पूरा बताया जा रहा है।
सीएम डैश बोर्ड के रिपोर्ट में जिले के लगभग शतप्रतिशत विद्यालय 16 से 19 पैरामीटर पर संतृप्त हैं। विभागीय विकास कार्यों की पोल जिला मुख्यालय लोढ़ी से महज एक किमी दूर प्राथमिक विद्यालय घसिया बस्ती के पड़ताल में खुली।
यहां आकर विकास के दावे खोखले हो जाते हैं। शत प्रतिशत आदिवासी बच्चों वाला ये स्कूल अधिकारियों की उपेक्षा का शिकार हैं। इस स्कूल को तत्कालीन बीएसए रहे हरिवंश कुमार और नवीन पाठक ने दो साल के लिए गोद लिया था।
जंगल से घिरे इस स्कूल जाने के लिए पक्की सड़क नहीं है। जंगल के बीच पगडंडी से होकर बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। पगडंडी में उगी बड़ी-बड़ी झाड़ियां के बीच जाने वाले बच्चों में बिषैले जंतुओं के काटने का भय बना रहता है। हालांकि जिम्मेदार इससे अनजान हैं।
बिजली नहीं पहुंची, शौचालय में टंकी नहीं
स्कूल के पास लगा हैंडपंप महीनों से खराब है। हैंडवाश यूनिट सक्रिय नहीं है। इस स्कूल का शौचालय बिना टंकी वाला है, जो उपयोग लायक नहीं है। स्कूल के बच्चों को शौच के लिए खुले में जाना होता है। मुख्यालय स्तर के इस स्कूल का बाल संरक्षण आयोग की टीम भी निरीक्षण कर चुकी है। अन्य स्कूलों की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है।