रेणुकूट (सोनभद्र)। नगर में अंग्रेजी मीडियम की कॉपी किताबों को बेचने के पीछे कमीशन का बड़ा खेल चल रहा है। नए शैक्षणिक सत्र में बच्चों को स्कूल भेजने के लिए अभिभावक कई दिनों से शिक्षण सामग्री के खरीदारी की तैयारी में जुटे हैं। दूसरी ओर विद्यालय प्रबंधक निजी प्रकाशकों से मिलकर अभिभावकों के जेब पर डाका डाल रहे हैं। मुख्य बाजार में दो दर्जन दुकानों के बावजूद एक ही दुकान पर अधिकतर विद्यालयों में चलने वाले किताबों का मिलना सवाल खड़ा करता है। बीते दस दिनों से नगर का चर्चित दुकानदार प्रतिदिन लाखों की बिक्री कर रहा है, वहीं बाकी दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में खाली खाली बैठे दिन बिता रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि नगर में स्टेशनरी की दर्जनों दुकानें हैं बावजूद एक दुकान से कॉपी किताब खरीदने का आदेश देकर स्कूल कमीशन का बड़ा खेल खेल रहे हैं। निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों के खरीदने से अभिभावकों का बजट बिगड़ रहा है। शिक्षा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह कोई नया खेल नहीं है। सबसे पहले प्रकाशकों के नुमाइंदे विद्यालयों में विजिट करते हैं। वहां 50 से 60 प्रतिशत कमीशन प्रबंधक से तय किया जाता है। फिर विद्यालय के अनुशंसा पर प्रकाशक अपनी किताबों को चुनिंदा दुकानों पर सप्लाई देते हैं। बताया जाता है कि दुकानदार इस एवज में विद्यालय को मोटा कमीशन देता है। बीते कुछ वर्षों में सांठ-गांठ से विद्यालय प्रबंधन मालामाल हुए हैं तो स्टेशनरी दुकानदार भी प्रतिमाह लाखों में मुनाफा कमा रहा है। विद्यालय एनसीईआरटी की पुस्तकें न चलाकर निजी प्रकाशकों की किताबों को पाठ्यक्रम में शामिल कर मोटा कमीशन वसूल रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा बेलगाम निजी विद्यालयों पर नकेल कसने के लिए कई दावे किए गए लेकिन अब तक हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। सीबीएसई बोर्ड द्वारा एनसीईआरटी की पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के स्पष्ट आदेश के बाद भी प्रबंधन नये सत्र में निजी प्रकाशकों के किताबों को चलाने पर जोर देते हैं। एक से पांच तक की कक्षाओं में एनसीईआरटी की किताबें नदारद है। केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा एक से लेकर 12 तक एनसीईआरटी की किताबों को प्राथमिकता दिया जाता हैं।