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टमाटर किसानों को नहीं मिल पा रहा लागत मूल्य

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करमा। कभी दिल्ली की मंडियों से होकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की मंडियों तक अपनी पहुंच रखने वाले करमा के लाल रसीले टमाटर अब उपेक्षित हैं। बाजार में इनकी उचित कीमत न मिलने से किसान मायूस हैं। किसानों को खेती की लागत का मूल्य भी नहीं मिल पा रहा, जिससे उनमें निराशा हैै। करमा क्षेत्र में अब टमाटर निकलना शुरू हुआ है। लेकिन इसका मंडियों में रेट महज साढ़े चार रुपये किग्रा है। ठंड भी पड़ रही है। ऐसे में टमाटर के किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच गई हैं। करीब एक बीघा टमाटर की खेती करने में 25 से 30 हजार रुपये की लागत आती है। जब शुरुआत में ही टमाटर के भाव अच्छे नहीं मिले तो किसानों की लागत भी निकल पाना मुश्किल होगा। ठंड अधिक पडने से टमाटर के पौधों में पाला मारने का डर किसानों को चिंतित कर रहा है। टमाटर किसान रतन कुमार जायसवाल का कहना है कि यदि सरकार की तरफ से धान, गेहूं या अन्य फसलों की तरह टमाटर का भी समर्थन मूल्य निर्धारित कर सरकारी खरीद की व्यवस्था कर दी जाए तो किसान खुशहाल हो जाएगा। या फिर क्षेत्र में कोई टोमैटो केचप की फैक्टरी लगा दी जाए तो किसानों को टमाटर फेकना नहीं पड़ेगा। संजय पटेल ने बताया कि उन्होंने एक व्यक्ति का खेत रेहन पर चार बीघा लिया है। प्रति बीघा 12 हजार रुपये की दर से खेत मिला है। इसमें टमाटर की खेती किया लेकिन अब तक लागत का 25 प्रतिशत धन भी नहीं निकल पाया है। रामपति पटेल का कहना है कि वर्तमान सरकार चाहती तो वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट में जिले के टमाटर की खेती को उत्थान के लिए चयनित कर सकती थी, लेकिन सरकार ने भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे क्षेत्र के टमाटर किसानों का भला हो सके। उधर जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा ने बताया कि जिले में चार से पांच हजार हेक्टेयर भूमि पर टमाटर की खेती होती है। सरकार ने अन्य फसलों की तरह टमाटर का समर्थन मूल्य तय नहीं किया है। न ही कोई क्रय केंद्र की व्यवस्था की गई है।
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