जिले में थैलेसीमिया के 42 मरीज हैं। इसमें 36 ऐसे हैं, जिनकी उम्र दस साल से भी कम है। खेलने-कूदने और मौज मस्ती करने की उम्र में यह बच्चे गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। इन्हें हर माह अलग से रक्त की जरूरत होती है। विडंबना है कि मरीजों की इतनी बड़ी संख्या के बाद भी जिले के ब्लड बैंक में सेप्रेशन यूनिट (रक्त कणों को अलग करने वाली मशीन) चालू नहीं है। इस कारण मरीजों को पूरा ब्लड चढ़ाना पड़ता है, जो कई बार उनके लिए खतरनाक हो जाता है। हर माह ब्लड जुटाने के लिए भी मरीजों के परिवारवालों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक एसएस पांडेय के अनुुसार थैलेसीमिया एक रक्त संबंधी बीमारी है, जो अनुवांशिक होती है। बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाले इस रोग की पहचान जन्म के तीन महीने बाद हो पाती है। आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र घटकर सिर्फ 20 दिन ही रह जाती है। इसका सीधा असर व्यक्ति के हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। इससे हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है। सही इलाज न मिलने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है। मरीज में खून की कमी को पूरा करने के लिए उन्हें बाहर से खून चढ़ाना पड़ता है। खून की कमी से मरीज के शरीर में हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता और उन्हें एनीमिया हो जाता है। मरीज को जीवित रहने के लिए हर दो से तीन सप्ताह बाद खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है।
जागरूकता के अभाव में बढ़ रही बीमारी
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रशांत शुक्ला बताते हैं कि यह माता या पिता या दोनों की जींस में गड़बड़ी के कारण होता है। किसी व्यक्ति के शरीर में अल्फा और बीटा दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जींस में गड़बड़ी होने पर थैलेसीमिया रोग हो जाता है। थैलेसीमिया की बीमारी को लेकर अधिकतर लोगों में जागरूकता का अभाव है। थैलेसीमिया होने पर सर्दी-जुकाम बना रहता है और मरीज हमेशा बीमार महसूस करता है। सांस लेने में तकलीफ होती है और शरीर में कमजोरी और दर्द रहता है। इसके अलावा दांतों का बाहर की ओर आ जाना, उम्र के अनुसार शारीरिक विकास न होना, शरीर का पीला पड़ना आदि लक्षण हैं। अगर किसी को खून न बनने की शिकायत है तो चिकित्सक को जरूर दिखाएं।
माइनर और मेजर
डॉ. नीरज मिश्र बताते हैं कि थैलेसीमिया दो तरह का होता है। पहला माइनर और दूसरा मेजर। किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है, लेकिन अगर महिला और पुरुष दोनों के क्रोमोजोम खराब हो जाते हैं तो ये मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनता है। इसकी वजह से बच्चे के जन्म लेने के छह महीने बाद उसके शरीर में खून बनना बंद हो जाता है। उसे बार-बार खून चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है। थैलेसीमिया मरीजों को ल्यूको फिल्टर ब्लड चढ़ाने की जरूरत होती है।
सेप्रेशन यूनिट न चालू होने से दिक्कत
जिले में थैलेसीमिया के मरीजों संख्या 42 है, जिन्हें प्रत्येक माह ब्लड की जरूरत होती है। यहां पंजीकृत मरीजों को निशुल्क में बिना डोनर के रक्त प्रदान किया जाता है। हालांकि इन मरीजों को पूरा ब्लड ही दिया जाता है। इसका प्रमुख कारण जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में सेप्रेसन यूनिट के चालू न होने ने परेशानी हो रही है। मशीन की व्यवस्था न होने के कारण खून से व्हाइट ब्लड सेल (डब्ल्यूबीसी) को अलग नहीं किया जाता है। ऐसे में अतिरिक्त मात्रा में डब्ल्यूबीसी जाने से मरीज को कुछ दिक्कतें भी होती है। कुछ माह पूर्व शोधित रक्त की मांग के लिए दो बच्चों के साथ उनके परिजन धरने पर बैठ चुके हैं।