ओबरा। कोयला और पत्थर खदानों के लिए बारूद की बड़ी खपत रखने वाले जिले में कई बार विस्फोट की गूंज दूर तक सुनाई पड़ी है। 2009 में जहां एक खदान में हुए विस्फोट में जहां दो मजदूर जिंदा झुलस गए थे। वहीं 2012 में ओबरा थाने में हुए विस्फोट की गूंज ने उच्च स्तर पर हड़कंप मचाकर रख दिया था। अक्तूबर 2015 में खनन क्षेत्र रासपहाड़ी में अवैध भंडारण में हुए विस्फोट ने आठ मजदूरों के चीथड़े उड़ा दिए थे, जिसकी गूंज लखनऊ तक सुनाई दी थी। इसके बाद ऑनलाइन व्यवस्था लागू की गई, जिससे विस्फोटकों के रख-रखाव-आपूर्ति की तस्वीर काफी बदली। छह नवंबर को मधुपुर इलाके के बहुआर में सुअर मारने में प्रयुक्त किए जाने वाले बड़े पटाखेेे के विस्फोट ने एक मकान की दीवार धराशायी कर दी थी लेकिन बड़ा हादसा न होने से लोगों ने राहत की सांस ली थी। बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र में पत्थर खनन में विस्फोटकों का भारी मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इसके प्रयोग के लिए सुरक्षा उपायों के कड़े इंतजाम का दावा किया जाता है लेकिन विस्फोटकों का सुरक्षित इस्तेमाल, भंडारण न होने से कई जिंदगियां विस्फोट की भेंट चढ़ चुकी हैं। अक्तूबर 2015 में हुए विस्फोट के बाद विस्फोटक लाइसेंसधारकों और पट्टाधारकों को कई हिदायतें दी गई थीं। उसके बाद खनन क्षेत्र में असुरक्षित विस्फोट की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई लेकिन रख-रखाव पर कड़ी निगरानी बनाए रखने की मांग लगातार बनी हुई। उधर, क्षेत्राधिकारी ओबरा ज्ञान प्रकाश राय ने बताया कि खनन क्षेत्र में होने वाले विस्फोटक इस्तेमाल को लेकर पूरा एहतियात बरता जा रहा है। समय-समय पर लाइसेंसधारकों एवं पट्टाधारकों की बैठक लेकर सुरक्षित इस्तेमाल और भंडारण के दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। भंडारण स्थलों की भी निगरानी कराई जा रही है।